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रविवार, 25 अक्टूबर 2026

प्रतिरोध का जंगल

तुम्हारे दमन ने

मृत्युदंड के आदेश पर
हस्ताक्षर करके
निब तोड़ने की
परम्परा का
निर्वहन किया।

पर

प्रतिरोध के बीज
इतने सूक्ष्म थे
कि
फाँसी के फंदों को भी
नकार गए।

तुमने उन्हें
नगण्य समझकर
नज़रअंदाज़ कर दिया।

और...
यही
तुम्हारी भूल थी।

तुम्हें क्या पता—
बीजों का स्वभाव ही है
अँधेरे में
जड़ें जमाना।

एक दिन
तुम्हारी बनाई
दीवारों की दरारों से
वे निकलेंगे—

और
तुम्हारे दमन की छाती पर
उसी टूटे हुए निब से

प्रतिरोध का
एक पूरा जंगल
लिख देंगे।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

स्याही की ताकत

 

धवल कागज़ पर
स्याही
धब्बा नहीं होती,
वह
कागज़ का श्रृंगार होती है।

कभी
उसी स्याही ने
"वंदे मातरम्" लिखा था,
और
उसी स्याही ने
दमन के परचम को
स्याह कर दिया था।

उसी स्याही ने
"खोल दो" लिखा,
तो
विभाजन की सियासत का
नंगा चेहरा
दुनिया के सामने रख दिया।

स्याही
इंकलाब का
दूसरा नाम है।

कालिख
नहीं जानती
स्याही की ताक़त।

उसे क्या मालूम—
काला होना
और
इतिहास लिखना,
दो अलग-अलग बातें हैं।

और जब
सत्ता के इशारे पर
यही स्याही
जनसंघर्ष के
आदमकद चेहरे पर
उछाली जाती है,

तब वही स्याही
चेहरे पर
कुछ ऐसा लिखती है

कि
चेहरा
काला नहीं होता,

बल्कि
रक्ताभ हो
दमक उठता है।

बुधवार, 29 जुलाई 2026

गाली से आगे

 

हवा में गूँज रही है
एक पंक्ति—
"लड़की होकर गाली दे रही है।"

पर इससे पहले
किसी ने कब कहा था—
"लड़का होकर गाली दे रहा है?"

या फिर—
"लड़की होकर भी चुप क्यों रहती है?"

उनका प्रतिकार
यदि गालियों की शक्ल में भी फूटा,
तो याद रखिए—
हर गाली से पहले
बहुत-सी अनसुनी चीखें
दम तोड़ चुकी होती हैं।

मैं गालियों का पक्षधर नहीं,
प्रतिकार का पक्षधर हूँ।

फिर भी
गालियाँ देती लड़कियाँ
मुझे अच्छी लगती हैं,
क्योंकि गालियाँ
इस मुक्ति की
पहली सीढ़ी भर हैं।

प्रतिकार के इस स्वर को
एक दिन
गालियों से परे
अपना मुहावरा गढ़ना होगा।

तंग गलियों से निकलकर
खुले आसमान में
अपनी आवाज़ की
पहचान बनानी होगी।