मैंने
एक शब्दकोश के
समस्त शब्दों को
निर्देशित किया—
एक
कविता के लिए।
और
उन्हें
एक
विस्तृत जाल की तरह
फैला दिया
शब्दों से
शब्द टकराते रहे,
कुछ इधर,
कुछ उधर
बिखरते रहे।
पर
कविता के नाम पर
उपलब्धि वही रही—
वह इस जाल में नही फंसी
और
फिसल गयी
मैंने
हार नहीं मानी।
इस बार
कुछ अलग करने की ठानी।
शब्दकोश से बाहर निकल आया,
और
चिंतन के भीतर उतर गया।
वहीं
मुझे कुछ शब्द मिले—
परेशान,
सहमे,
प्रतीक्षारत।
वे ऐसे दिखे
जैसे
अभी-अभी रोपे गए
धान के नन्हे पौधे—
जिन्हें
कविता नहीं,
बस
थोड़ा-सा पानी,
थोड़ी-सी धूप
और
बहुत-सा समय चाहिए था।
मैंने
उन्हें फिर
निर्देशित नहीं किया
किसी कविता में ढलने के लिए।
बस उन्हें समय दिया
वे शब्द नहीं,
बीज थे।
समयांतराल
के बाद
वे
फूटे,
अंकुराए,
और जब कविता बने—
तो पता चला,
शब्द नहीं रो रहे थे,
एक नन्ही बच्ची रो रही थी।
और
कुछ शब्दों की शक्लें
क्षत-विक्षत कबूतरों जैसी थीं—
जिनकी उड़ान
किसी गिद्ध ने
उड़ने से पहले ही
नोच डाली थी।

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