सुना है
जनगणना होने वाली है,
और इन दिनों
मकान गिने जा रहे हैं।
काश—
इस गणना से पहले
हो पाती
बेमकानों की गिनती।
तुम गिन लोगे
छत, दीवार, खिड़कियाँ,
पर्दे—
पर छूट जाएगा
वो “घर”,
जिसने आसमान को ही
अपनी छत मान लिया है।
तुम्हारे आँकड़ों में दर्ज होंगे
ईंट, पत्थर, फर्श
की डिज़ाइन—
एक सजी-संवरी संख्या-तालिका,
पर नहीं होगा कोई पता
उनका,
जिनकी रातें
फुटपाथों, डिवाइडरों
और सड़कों के किनारों पर कटती हैं—
जहाँ हवा भी
पहुँचने से पहले
हिचकती है।
क्या तुम्हारे प्रपत्र में
कोई जगह है
उनके लिए—
जिनका शरीर ही मकान है,
झलकती पसलियाँ दीवार,
हथेलियाँ दरवाज़े,
और आँखें—
एक अधखुली खिड़की,
जिससे झाँकती है
भूख, ठंड और इंतज़ार?
या फिर इस बार भी
वे सिर्फ “अनुमान” बनेंगे,
औपचारिकताओं में दर्ज होकर
आँकड़ों की भीड़ में
बिना गिने ही
गायब कर दिए जाएँगे?
और अंत में—
जब गिने जा रहे हैं
मकान और इंसान,
तो क्या कभी
पीड़ा और संत्रास की भी
कोई गणना होगी?
या फिर
दर्द हमेशा की तरह
आँकड़ों से बाहर ही
बेघर रह जाएगा।

17 टिप्पणियां:
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में मंगलवार 28 एप्रिल, 2026
को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
सरकारें दर्द नहीं गिनतीं वह काम जनता के हिस्से में है
शुक्रिया
यकीनन
यही तो दर्द है
आपने बहुत सटीक तरीके से उस सच्चाई को सामने रखा, जिसे हम रोज़ देखकर भी नजरअंदाज कर देते हैं। मुझे “शरीर ही मकान है” वाली पंक्ति सबसे ज्यादा चुभी, क्योंकि वह पूरी तस्वीर साफ कर देती है।
Wah!!
शुक्रिया
आप ने संजीदगी से समग्र मूल्यांकन किया
शुक्रिया
आप ने संजीदगी से समग्र मूल्यांकन किया
Thanks 😊
बहुत ही हक़ीक़त है जनगणना का चित्रण बिना गिने ही ग़ायब कर दिए जायेंगे सही लिखा है
Thanks 😊
सत्य तो यही है...कड़वा है..कि ..दर्द हमेशा की तरह
आँकड़ों से बाहर ही
बेघर रह जाएगा। सदैव की भांति
शुक्रिया
दर्द की गिनती कभी हो भी नहीं सकती ।
दर्द की दवा करना हम सबका ज़िम्मा है ।
शुक्रिया, आपने याद दिलाया ।
शुक्रिया 😃
सत्य और दर्द छिपा है रचना में , बेमकानों के पते भला कहीं दर्ज होते हैं ! अपने ही वतन में जलावतन जैसे ।
शुक्रिया 😃
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