गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

व्यवस्था की लाश

जीतू मुंडा,
तुमने अपनी बहन का कंकाल उठाया
यह साबित करने के लिए
कि वह सचमुच मर गई है।

 

पर तुम भूल गए
जिनके सामने तुम खड़े थे,
उनके कंधों पर पहले से ही
सच और संवेदना की लाशें सड़ रही थीं।

 

उनकी आँखों की शर्म
और कानों की सुनवाई
किसी अंधे गोदाम में गिरवी रखी जा चुकी थी,
जहाँ हर चीख
फाइल बन जाती है,
और हर फाइल पर
धूल की सरकारी चादर डाल दी जाती है।

 

फिर भी
तुम हारे नहीं,

 

क्योंकि तुम्हारे कंधे पर
सिर्फ एक कंकाल नहीं था,
पूरी अंधी व्यवस्था का
जिंदा सबूत लटका हुआ था।


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