हमारे
आँकड़े आत्मनिर्भर हैं,
क्योंकि संकलन
धृतराष्ट्रीय आँखें करती हैं।
संजय के रंगीन चश्मे के पीछे
अनुवादक आँखें
विनाश को विकास बताती हैं।
मायावी शब्दबाण सिद्धहस्त हैं—
“अश्वत्थामा मारा गया”
के तर्ज पर
संधान करने को।
यहाँ हर पराजय
रणनीतिक विजय कहलाती है,
हर कराह
उत्सव का शोर बन जाती है।
भूख को
“संयम” लिख दिया जाता है,
और बेरोज़गारी को
“आत्मनिर्भरता का अवसर”।
सबसे कष्टदायी है
सार्थक प्रश्नों को
किसी कुंवारी की कोख से जन्मे
नवजात-सा
कूड़े के ढेर में पड़ा देखना।
धृतराष्ट्र प्रसन्न हैं—
क्योंकि दरबार में
संजय अभी भी वही देख रहा है
जो उसे
दिखाने को कहा गया है।
मंगलवार, 17 मार्च 2026
कूड़ेदान में प्रश्न
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