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सोमवार, 13 मई 2019

लुटा हुआ ये शहर है

ख़बर ये है कि 
ख़बरों में वो ही नहीं
जिनकी ये ख़बर है
.
डर से ये 
कहीं मर न जाएं
बस यही डर है
.
लूटेरे भी 
लूटेंगे किसको?
लुटा हुआ ये शहर है
.
दवा भला 
असर करे कैसे?
शीशियों में तो ज़हर है
.
मंजिल तो
इस रास्ते पर है ही नहीं
अँधा ये सफर है
.
खौफजदा,
गुमनाम सा, दुबका हुआ
ये शेरे-बबर है
.
नाम तो है
पर बताये कैसे?
खौफ का इतना असर है
.
मुआवजा तो खूब मिला
पर उनको नहीं
जिनके उजड़े घर हैं

गुरुवार, 3 जून 2010

तुम श्वासों की गति पर ध्यान न देना ~~


तुम तलाशना मत
अपने खोये 'खोयेपन' को
उसे तो
मैनें सहेज लिया है,
तुम श्वासों की गति पर भी
ध्यान न देना
मेरे श्वासों संग अनुनादित होकर
इनका तीव्र होना तय है,
कोई खास बात नहीं है
कमरे में रखी मोमबत्ती का
धीरे-धीरे पिघलना
यह पिघलन असर है
जलती लौ की तपिश का,
कुछ शब्द लिखना तुम
मेरी पीठ पर
मैं उन्हें अनुमान से
पढ़ना चाहता हूँ
वजह न होते हुए भी
बेशक तुम रूठ जाना
मनाना सीखा है
असर देखूँगा
बस्स,
तुम उदास मत होना
यहीं मैं चूक जाऊँगा
और तुम्हारे साथ साथ
मैं भी उदास हो जाऊँगा
मैं भी ...

रविवार, 30 मई 2010

एक दस्तक तुम्हारे दरवाजे के नाम ~~

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भेजा था मैनें,
उस दिन एक दस्तक
तुम्हारे दरवाजे के नाम
और तुम्हारा दरवाजा
अनसुना कर गया था;
तभी तो
खुलने से मना कर गया था.
मुझे पता है
यह हौसला
दरवाजे का नहीं हो सकता
वह उन दिनों
तुम्हारे 'फैसले' की सोहबत में था.
शायद उसने यह बात
तुमसे भी नहीं बतायी होगी
हताश-परेशान मेरे दस्तक ने
बिना मेरी अनुमति के
मेरी आँसुओं के चन्द कतरे
तुम्हारी ड्योढी पर रखा था.
चश्मदीदों ने बताया
तुम उसे सहेजने की फ़िराक में हो
आज फिर एक दस्तक
तुम्हें चौकन्ना करने के लिये
कि आँसू के उन कतरों को
सहेजना मत,
वे सैलाब बन जायेंगे.
पड़े रहने देना तुम
वहीं ड्योढी पर
सूरज की तपिश
उन्हें भाप बना देगी,
या  फिर शायद
तुम्हारे दरवाजे की
ड्योढियों पर उगे पौधों की जड़ें
अवशोषित कर ले.
मेरे आँसुओं का मकसद
तुम्हें ठंडक पहुँचाना ही तो है.

सोमवार, 24 मई 2010

पत्नी रोज़ सामानों की लिस्ट पकड़ा देती है लौटते समय लाने के लिये ~~

कई बार
और अक्सर
पूरी की पूरी व्यवस्था को
नकारने के बावजूद
न केवल उस व्यवस्था में बने रहने की
मज़बूरी होती है
वरन
व्यवस्था को व्यवस्थित करने में
धूरी  बन जाना पड़ता है,
बहाने और समझौते
बन चुके हैं हमारी आदत
और हम खामोशी से देखते हैं
स्याह बादलों का जमघट
सिद्धांतो और आदर्शों की
अनवरत शहादत,
ऐसा भी नहीं कि
कोई प्रतिकार ही न हो
अक्सर हम
रात के सन्नाटे में
लच्छेदार शब्दों में
इन सबके ख़िलाफ रिसाले भी रचते हैं
सुबह होते ही
न जाने कैसे
इन रिसालों के स्वर
अनायास बदल जाते हैं,
बदले भी क्यूँ नहीं
पत्नी रोज़ ही तो
सामानों की लिस्ट पकड़ा देती है
लौटते समय बाज़ार से लाने के लिये.




सोमवार, 17 मई 2010

पंचतारे लिख रहे गरीबी पर निबन्ध ~



श्मशानी सफर और लोहबानी गन्ध
जिन्दगी के लिये मौत से अनुबन्ध
.
रिसते हुए रिश्तों की खुलती है गाँठ
पंचतारे लिख रहे गरीबी पर निबन्ध
.
सपने परोस दिया और क्या चाहिए
सच्चाई देखने पर लगा है प्रतिबन्ध
.
खोने को कुछ नहीं बेफ़िक्र हो जा
आज के भोजन का कर लो प्रबन्ध
.
वहशीपन का दबदबा, शिकायत क्यूँ
तुमने ही तो चुना था उष्णकटिबन्ध
.
निर्गन्धी फूल देख असहज़ क्यूँ हो
हमने ही तो चुराया है इनकी गन्ध
.
सवालिया निगाहों को फेर लो ज़रा
आज फिर करना है नया अनुबन्ध

सोमवार, 3 मई 2010

अपनी रोटी छीन ~~

एक–दो–तीन

अपनी रोटी छीन

.

बाजुएँ उठा

क्यूँ है तूँ दीन

.

बिखर गये हैं

फिर से उनको बीन

.

नज़रें तूँ खोल

मत हो इतना लीन

.

खिसकने न दे

पैरों तले की जमीन

.

सच्चाई देख

तुम भी हो ज़हीन

.

सुलझाओ उलझन

मन ना कर मलीन

.

नागों के दंश

उठा लो अपनी बीन

.

एक–दो–तीन

अपनी रोटी छीन

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

याद करने लगे हैं लोग पिछला दंगा ~

जब आदमी फितरत से हो जाये नंगा
मत लेना तुम उससे भूलकर भी पंगा
.
वह तो जमीर बेचकर आया है भाई
उसे क्या वह पल में उठा लेगा गंगा
.
तोड़ता है क्योंकि वह खुद ही टूटा है
देखने में क्यूँ न दिखे वो भला-चंगा
.
सलीके की बात करता है देखिये तो
जिसकी जिन्दगी ताउम्र रही बेढंगा
.
अनजान लोग दिख रहे है शहर में
याद करने लगे हैं लोग पिछला दंगा

रविवार, 18 अप्रैल 2010

घरौन्दे की नींव आज रखिये

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हथेली पर अपने ताज़ रखिये

कुछ तो नया अन्दाज़ रखिये

.

आप तो आप हैं, नाम बेशक

रीना, मेरी या शहनाज़ रखिये

.

ज़माना कान लगाये बैठा है

दफ़्न अपने कुछ राज़ रखिये

.

बेसुरापन है, शोर का मंजर है

संग अपने अपना साज़ रखिये

.

वज़ूद सलामत रखनी हो तो

निगाहों में आप बाज़ रखिये

.

सराहे कोई, क्यों है इंतजार

खुद ही खुद पर नाज़ रखिये

.

कल का इंतजार क्यूँ है भला

घरौन्दे की नींव आज रखिये

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

चमक अन्धेरों की ~~

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हाँ देखा है मैनें

धुन्धलाते उजाले;

चमक अन्धेरों की

कौतूहल, जिज्ञासा

आंसू और दिलासा

जानता है पर

मानता कौन है !!

राजनीति के रिश्ते

रिश्तों की राजनीति

मजहब, सम्प्रदाय

चुस्कियाँ और चाय

भागते दिन

ठहरती रात

शुरू भी नहीं होती कि

खत्म हो जाती बात

दिखने को

खून के रिश्ते

पर पल पल

रिश्तों का खून

चमचमाते खंजर

श्मशानी मंजर

आस्तीन के साँप

साँपों के दंश

पलांश में मिटते

वंश के वंश

जमीं पर पांव

पांव में छाले

हाँ देखा है मैने

धुन्धलाते उजाले !

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

छोटकी बेमार बा बाकी सब ठीक हौ (भोजपुरी)

मत करा तूं जियरा हलकान अम्मा

काहें एतना हो गइलू परेशान अम्मा

छोटकी बेमार बा बाकी सब ठीक हौ

घर में दरार बा बाकी सब ठीक हौ

अबकी छुट्टी मिली त आइब जरूर

हम देत बाई तोहके जबान अम्मा

मत करा तूं जियरा हलकान अम्मा

काहें एतना हो गइलू परेशान अम्मा

.

भोरहरी में उठे क आदत तूँ छोड़ा

मीठ बोल-बतिया से सबके तूँ जोड़ा

कब ले बितईबू तूँ दिन मड़ई में

लउटब त बनवाईब मकान अम्मा

मत करा तूं जियरा हलकान अम्मा

काहें एतना हो गइलू परेशान अम्मा

.

गिरल बरधा भी उठ जाई हो अम्मा

भर-भर नाद सानी खाई हो अम्मा

सींग आ गयल होई अब त बछवा के

करवाई दीह ओकार नथान अम्मा

मत करा तूं जियरा हलकान अम्मा

काहें एतना हो गइलू परेशान अम्मा

आज उम्र के इस पड़ाव पर माँ के आंचल मे सिर रखने की इच्छा हुई. मेरे लिये भोजपुरी माँ के आंचल से कम नहीं है.

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

आज पहना दिया उसके गले में किसी और ने हार

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आज पहना दिया

उसके गले में

किसी और ने

हार

वह गुमसुम सा

खड़ा है

जिन्दगी को

हार

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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हर्षित हैं शाख पर पत्ते

झूम रही है

डाली

एक अर्से के बाद

तूने फिर से झूला

डाली

रविवार, 28 मार्च 2010

लुटा अपनी रिश्तेदारी में ~~~~

सारी उम्र कटी यूँ तो सिपहसालारी में

मारा गया बेरहमी से मगर वो यारी में

.

इम्तहान तो था महज़ कुछ घंटों का

पूरा साल निकल गया देखो तैयारी में

.

बहुत ढूढ़ा खोया था जो इकलौता बीज

अंकुरित हुआ तो मिला इस क्यारी में

.

बीहड़ों में से हो आया बेखौफ मुसाफिर

लुटा तो आकर वो अपनी रिश्तेदारी में

.

लहुलुहान हर फूल है देखो दुबका हुआ

जब से कैक्टस आ पहुँचा फुलवारी में

.

बेमौत मरा पीठ पर खाकर वो गोली

पेट की खातिर खोखे चुनते चाँदमारी में

.

कितने मासूम परस्त हैं यहाँ के लोग

देखना हो आकर देखो तुम निठारी में

बुधवार, 24 मार्च 2010

उसकी लालसा ~~~

आपने

मेरे हर मसले पर

अपना बेबाक

नज़रिया दिया,

ये अलग बात है कि

इन्हें पूरा करने को

आपने तो कोई भी

न ज़रिया दिया.

~~~~~

मेरे तेरे बीच

अब तो कोई रहा

ना राज,

फिर क्यूँ रहती हो तुम

अक्सर मुझसे

नाराज.

~~~~~~~

उसकी तो

अब बस यही है

लालसा,

कि गोदी में आ जाये

अब कोई

लाल सा.

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

नयनों की भाषा ~~

 


यह रचना 1980 में लिखी थी जो मुक्ता पत्रिका (दिल्ली प्रेस) में प्रकाशित हुई थी. उस समय मैं सुनीत 'अंकुर'  नाम से लिखता था.