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सोमवार, 20 मई 2019

मासूम के पर कुतरे होंगे ---

कितनी जद्दोजहद से वे गुजरे होंगे
तब कहीं गहरी झील में उतरे होंगे

उड़ान भरने से कतरा रहा है परिंदा
बेरहम ने मासूम के पर कुतरे होंगे

दर्द छुपा लेते है लोग आसानी से
नीद मे मगर जरूर ये कहरे होंगे

जज्बात हों नहीं, ये हो नही सकता
जज्बात किसी मोड़ पर ठहरे हो़गे

मासूमों की चीखें सुनते ही नहीं हैं
एहसासों से ये लोग तो बहरे होंगे 

कौन झकझोर गया इन शाखों को
फूल ये बेवजह तो नहीं झरे होंगे

हर शख्स का अपना अक्स होता है
चेहरे दर चेहरे बेशक सौ चेहरे होंगे

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

घड़ियाली आँसू अब बहाये जायेंगे ...

तरकश के सारे तीर चलाये जायेंगे
शफ्फाक धवल वस्त्र सिलाये जायेंगे 

जिनकी आँखे पथरा गयी हैं उनमें
आयातित सपने भी जगाये जायेंगे

वायदों के तिलस्मी दीवार के पीछे
आस के मृगछौने भटकाये जायेंगे

ताकि झूठ का जाल नज़र न आये    
देखना अब गंगाजल उठाये जायेंगे

ये सिलसिला बदस्तूर जारी रहा है   
घड़ियाली आँसू अब बहाये जायेंगे 

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

दाल में सब काला है ….



यही तो गड़बड़झाला है 
दाल में सब काला है 
. 
ओहदे पर तो होगा ही   
वो जब उसका साला है 
. 
कैसे कहें जो कहना है 
मुंह पर लगा ताला है 
. 
शायद किस्मत साथ दे 
सिक्का  फिर  उछाला है 
. 
शब्दों के बगावती तेवर 
परेशानी में वर्णमाला है 
. 
किरदार समझने लगे हैं 
दुनिया एक रंगशाला है 
. 
जख्मों ने मेरे जिस्म को 
समझ लिया धर्मशाला है

शुक्रवार, 22 जून 2012

जिस्म पर कीलें गाड़ देता है ….


मेरा रहबर हर कदम पर मुझको पहाड़ देता है
सूरज के कहर से बचाने के लिए ताड़ देता है
.
आशियाना बनाने में वह इस कदर मशगूल है
न जाने कितनों का वह छप्पर उजाड़ देता है
.
हालात बयाँ करने के लिए जब भी खत लिखा
पता देखकर बिना पढ़े बेरहमी से फाड़ देता है
.
नयन नीर से सिंचित ज़ज्बाती इन पौधे को
देखा उसने जब भी जड़ से ही उखाड़ देता है
.
कई बार मैं मरा हूँ उसके लफ़्ज़ों के नश्तर से
बेरहम कातिलों को भी वह तो पछाड़ देता है
.
वारदात चहलकदमी करते हैं उसी के इशारे पर
मासूमियत से मगर हर बार पल्लू झाड़ देता है
.
दीवार कीमती है कहीं पलस्तर न उखड़ जाए
इस डर से वह मेरे जिस्म पर कीलें गाड़ देता है

बुधवार, 23 मई 2012

छत्तीस का आकड़ा है ….

छत्तीस का आकड़ा है
क़दमों में पर पड़ा है
.
आंसुओं को छुपा लेगा
जी का बहुत कड़ा है
.
उंगलियां उठें तो कैसे?
कद उनका बहुत बड़ा है
.
लहुलुहान तो होगा ही 
पत्थरों से वह लड़ा है
.
कब का मर चुका है
वह जो सामने खड़ा है
.
खाद बना पाया खुद को 
महीनों तक जब सड़ा है
.
कल सर उठाएगा बीज
आज धरती में जो गड़ा है

मंगलवार, 8 मई 2012

इस नगर में और कोई परेशानी नहीं है ….


खाना नहीं, बिजली और पानी नहीं है
इस नगर में और कोई परेशानी नहीं है
.
चूहों ने कुतर डाले हैं कान आदमी के
शायद इस शहर में चूहेदानी नहीं है 
.
चहलकदमी भी है, सरगोशियाँ भी हैं
मंज़र मगर फिर भी तूफानी नहीं है
.
आये दिन लुट जाती है अस्मत यहाँ
कौन कहता है यह राजधानी नहीं है
.
अपनों पर बेशक तुम यकीं मत करो
बेईमानों के बीच मगर बेईमानी नहीं है
.
बादलों को तो गगन चूमने नहीं दिया
कहते फिरे माँ का आँचल धानी नहीं है
.
हिस्से तुम्हारे इसलिए ‘किस्से’ नहीं हैं
क्योंकि संग तुम्हारे, तुम्हारी नानी नहीं है

बुधवार, 2 मई 2012

कांटे से ही कांटे को निकाला मैंने ….


जिस्म को बेइंतिहाँ उछाला मैंने
बिखरकर खुद को संभाला मैंने
.

बेदर्द का दिया दर्द सह नहीं पाया
पत्थर का एक ‘वजूद’ ढाला मैंने
.

किरदार छुपा लेते हैं एहसासों को
खुद को बना डाला रंगशाला मैंने
.

एहसास उनके रूबरू ही नही होते
न जाने कितनी बार खंगाला मैंने
.

अब क्या दिखेंगे जख्म के निशान
ओढ़ लिया है जबकि दुशाला मैंने
.

जब हो गया मजबूर हर नुस्खे से
कांटे से ही कांटे को निकाला मैंने
.

ताकि ये किसी और को न डसें
आस्तीनों में साँपों को पाला मैंने

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

‘कृपा' के व्यापारी ……..


शातिर ये शिकारी हैं
‘कृपा’ के व्यापारी हैं
.
बीमारी दूर करेंगे क्या
खुद ये तो बीमारी हैं
.
इनके सफ़ेद वस्त्रों में
जेब नहीं आलमारी हैं
.
रिश्तों को किश्तों में
बेचने वाले पंसारी हैं
.
घुटनों के बल रेंग रहे
फिर भी क्रांतिकारी हैं
.
जोड़कर माया-स्विश
बनते ये अवतारी हैं
.
धन-साधन युक्त मगर
मत समझो संसारी हैं

बुधवार, 28 मार्च 2012

नयन कोर गीले क्यूं हैं ! !



चेहरे इतने पीले क्यूं हैं ?
नयन कोर गीले क्यूं हैं ?
.

माना अपनी मौत मरे हैं
इनके शरीर नीले क्यूं हैं ?
.

तुम जहां जश्न मना रहे
आसमान में चीलें क्यूं हैं ?
.

जो राह मुहैया की तुमने
वे इतने पथरीले क्यूं हैं ?
.

शांति सन्देशा लेकर आये
नज़रों में पर कीलें क्यूं हैं ?
.

गमगीनी के इस मंजर में
आप इतने रंगीले क्यूं हैं ?
. 

संस्कारित-सभ्यों के बीच
आदमखोर कबीले क्यूं हैं ?

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

कब्जे में ये खलिहान करते हैं ….


माना कि ये रक्तपान करते हैं
पर हर रोज गंगास्नान करते हैं
.
शक के दायरे से बचने के लिए
खुद ही को लहुलुहान करते हैं
.
लूटते हैं जब भी काफिले को
मुक्तहस्त से फिर दान करते हैं
.
हादसे जब होकर गुजर जाते हैं
शिद्दत से ये सावधान करते हैं
.
मुर्दों से इनकी जान पहचान है
कब्रिस्तानों में जलपान करते हैं
.
पर कुतरने की तैयारी होती है
जब किसी का सम्मान करते हैं
.
खेतों से इनका सरोकार नहीं है
कब्जे में ये खलिहान करते हैं

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

खुद पर खुद ही ख़ुफ़िया निगाह रखिये ….


अपनी बेगुनाही का हरपल गवाह रखिये
खुद पर खुद ही ख़ुफ़िया निगाह रखिये
.
दस्तूरन ‘सच’ जब शक के दायरे में हो
हो सके तो ‘झूठ’ को गुमराह रखिये
.
बचना चाहो जो बेवजह के ‘सलाहों’ से
औरों को लिए आप भी सलाह रखिये
.
‘मौत’ की खबर आम हो इससे पहले ही
सुगबुगा कर जिंदगी की अफवाह रखिये
.
माना कि किसी को परवाह नहीं आपकी
अपनों के लिए आप तो परवाह रखिये
.
तैनात हैं हर राह पर पत्थरों की ठोकरें
इनके पैनेपन की हरपल थाह रखिये
.
देखिये उन्होंने ‘गुलाम’ की चाल चली है
इसके ऊपर आप अपना ‘बादशाह’ रखिये

मंगलवार, 10 मई 2011

अपना जिस्म लहुलुहान रखते हैं .....

जेबों में अपने हर सामान रखते हैं
दिल में ये लोग तो दुकान रखते हैं
.
शातिर मंसूबों का ज़ायजा क्या लेंगे
दुश्मनों के लिए भी गुणगान रखते हैं
.
बिखर कर भी जुड़ जाते है पल में
जिस्म में अपने सख्तजान रखते है
.
मुआवजें जब शिनाख़्त पर होते हैं
वे अपना जिस्म लहुलुहान रखते हैं

.
टिकेंगे भी भला कैसे हल्फिया बयान
वे बहुत ऊँची जान-पहचान रखते हैं
.
सफर अंजाम पाये भी तो भला कैसे
राहगीरों के सामने वे तूफान रखते हैं
.
वे बेखौफ़ न हो तो भला क्यूँ न हों
हर जुर्म के बाद वे अनुष्ठान रखते हैं

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

आँकड़े प्रायोजित हैं ...


कभी यूँ ही हवाओं के संग भाग कर देखना
उनींदी आखों में सारी रात जाग कर देखना
.
अन्धेरी राहों से यूँ कतरा कर तो न निकलो
इनके नाम तुम बस एक चिराग कर देखना
.
ख़ौफ़जदा हैं; डरे-डरे से पड़े हैं अधमरे से जो
उनके हिस्से भी सूरज की आग कर देखना
.
हकीकत कुछ और है, आँकड़े प्रायोजित हैं
नए सिरे से फिर तुम गुणा-भाग कर देखना
.
जबकि सारा जमाना आमादा है बटोरने को
जरूरतमंद के लिये कुछ त्याग कर देखना

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

अफ़वाह है जिन्दगी… Life is rumor


कभी हाय तो कभी वाह है जिन्दगी
सतत और निर्बाध प्रवाह है जिन्दगी
.
चौराहों पर दम तोड़ती इंसानियत से
रूबरू औ’ चश्मदीद गवाह है जिन्दगी
.
जरूरतें जब मुँह बाये खड़ी होती हैं
यूँ लगता है कि तनख़्वाह है जिन्दगी
.
खुद को समेटने से कतराती रही है
देखिये किस कदर बेपरवाह है जिन्दगी
.
रिश्ता, दस्तूर, फर्ज, दुनियादारी का
प्रतिरोध रहित निर्वाह है जिन्दगी
.
आशिक युगल से पूछ कर तो देखिये
कह देंगे इक-दूजे से विवाह है जिन्दगी
.
ज़नाजे को कांधा देकर जब लौटेगा
खुद से कहेगा कि अफ़वाह है जिन्दगी

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

जुल्म के ख़िलाफ़ जंग ~~



जुल्म के ख़िलाफ़ तुम जंग लिखो

बदरंग कायनात है तुम रंग लिखो

.

हताश-परेशान हौसलों के ईर्द-गिर्द

हो सके तो मुकम्मल उमंग लिखो

.

करीब से देखो जिन्दगी के वाकये

मुस्कुराता हुआ एक प्रसंग लिखो

.

सतरंगी जो करना हो आसमाँ को

बादलों के नाम एक पतंग लिखो

.

संग कोई उम्र भर नहीं चलता है

खुद को तुम खुद के संग लिखो

.

.मोम है वह अपने अपनों के बीच

बेशक से उसका नाम दबंग लिखो

.

पलांश में ढहेगी शिकवों की दीवार

इक पल उनके नाम अंतरंग लिखो

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

हर दाने के नीचे एक जाल होता है ~~



हर लहू का रंग तो लाल होता है

फिर भी क्यूँ इतना सवाल होता है

.

कातिलों ने नया दस्तूर निकाला है

पहलू में इनके कोतवाल होता है

.

किसी के लिये मातम का दिन है

किसी के लिये कार्निवाल होता है

.

इंसाँ-इंसाँ करीब होना तो चाहता है

मज़हब पर बीच में दीवाल होता है

.

मासूम परिन्दे ये जानते तो नहीं हैं

हर दाने के नीचे एक जाल होता है

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

आग अभी बाकी है ~~


छुड़ाते रहे ताउम्र मगर दाग अभी बाकी है

मुतमईन होकर न बैठो आग अभी बाकी है


बुलबुले जितने थे सब के सब फूट गये है

सुगबुगाहट है अभी कि झाग अभी बाकी है


बेशक ओढ़ लो तुम अज़नबियत का चोला

नज़रें कह रही है कि अनुराग अभी बाकी है


दावा करते रहे कोई विषधर अब नहीं बचा

एहसास को डसने वाला नाग अभी बाकी है


अमावस का अन्धेरा है, अवसादों का डेरा है

अन्धेरे से लड़ता एक चिराग अभी बाकी है


यूँ तो मुरझा गया है मसला हुआ ये फूल

सुगन्ध ने बताया कि पराग अभी बाकी है


गफ़लत है जो खुद को फ़कीर मान बैठे हो

अंतस के अहं का परित्याग अभी बाकी है

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

हो रही है चहलकदमी अजनबियों की~~



रोज़ बामुश्किल यह शहर संभलता है
सांझ ढलते फिर धूँ-धूँ कर जलता है
.
रहनुमा आँकड़ों ने जब से हाल पूछा है
बेहोशी के आलम मे भी उछलता है
.
हो रही है चहलकदमी अजनबियों की
खौफ़ के साये तले यह अब चलता है
.
लुट चुकी है अब इसकी मासूमियत
बच्चों सा अब यह नहीं मचलता है
.
पथरीले एहसास इसकी आँखों में है
हर घड़ी अब यह तो रंगत बदलता है
.
सवालों के इश्तहार इसके माथे पर हैं
अनुत्तरित रहकर हाथ यह मलता है
.
यूँ तो अट्टालिकाओं से अटा पड़ा है
छाँव ढूढने के लिये रोज़ निकलता है

सोमवार, 26 जुलाई 2010

ताश के महल सा कांपता है मकाँ ~~


परिंदे यूँ ही नहीं घबरा रहे होंगे
गिद्धों के क़ाफ़िले मंडरा रहे होंगे

सिहर जाती हैं शाख़ों पे फुनगियाँ
कहीं निशाने पत्थर आ रहे होंगे

यूँ ही नहीं झर रहे हैं हरे पत्ते
जड़ों को उनके कीड़े खा रहे होंगे

ख़ौफ़ज़दा हैं पत्थर भी इस पहाड़ के
संगतराश आसपास आ रहे होंगे

आईने ने आज सच कह दिया जब
वो यक़ीनन तिलमिला रहे होंगे

उनके जिस्मों की तपिश बढ़ गई है
सूरज से आँखें अब मिला रहे होंगे

ताश के महल-सा काँपता है मकाँ
नींव को कुछ लोग हिला रहे होंगे

“वर्मा” ने तो सिर्फ़ आईना दिखाया है
चेहरे ये अपने-आप छुपा रहे होंगे

शुक्रवार, 11 जून 2010

बिस्तरों पर वे अजगर रखते हैं ~~



समुंदर में वे पूरा शहर रखते हैं
हालात पर फिर नज़र रखते हैं
.

मरीज़ की हालत सुधरे भी कैसे
दवा की जगह वे ज़हर रखते हैं
.

कर रहे हैं होशों-हवास का दावा

कदम इधर, कभी उधर रखते हैं
.

हर बात में सूखे पत्ते सा कांपते हैं

कहते हैं कि शेर का जिगर रखते हैं
.

बड़े फख्र से फिर वही दुहराते हैं

दाव में बीबी-बच्चे, घर रखते हैं
.


वे ही मिले ख़बरों की सुर्खियों में

जो सारे ज़हान की ख़बर रखते हैं
.

सोते रहोगे कब तक, देखो तो
बिस्तरों पर वे अजगर रखते हैं