शनिवार, 29 अगस्त 2009

मुर्दे में जान लाना है ~~


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मुझे तो ज़ज्ब ए तूफान लाना है
इस मुर्दे में भी तो जान लाना है

बहुत देख चुका शराफत का हश्र
शायद अब एक शैतान लाना है

अब तो मैने कमर कस ली है

मुझको अपना आसमान लाना है

ताकि नज़र में रहे उनकी हरकतें
हर हाल में ऊँचा मचान लाना है

खुद की पहचान से जो महरूम हैं
उनके लिये उनकी पहचान लाना है
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शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

हुक्मरान तालिबानी है ~~

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मौसम खुशगवार है, मन धानी है
क्या करें मगर हुक्मरान तालिबानी है

‘धान’ बोया तो सावन रूठ गया
‘अरहर’ के खेत देखिए—पानी-पानी है

आज ये है तो कल वो होगा ही
किस बात पर भला इतनी परेशानी है

संजो लिया है ज़ख़्म, छुपा लिया है
ये तो मेरे सबसे अज़ीज़ की निशानी है

यूँ ही नहीं चूमा है अपनी हथेली
मेरे लिए तो ये तुम्हारी ही पेशानी है

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शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

जिस्म से लपेट रखो भौरे का छत्ता ~~

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यकीन करो किसी और पर अलबत्ता
पर सलामत रखो खुद की भी सत्ता


चट कर जायेंगे वज़ूद तक तुम्हारा
जिस्म से लपेट रखो भौरे का छत्ता

ये रास्ता तो वही जाता है मुसाफिर
जहाँ लुट जाती है आदमी की इयत्ता

खुद हाथ थाम लो खुद के हाथों से
वरना उड़ जाओगे ज्यूँ पीपल-पत्ता

अभेद्य किले से बने है ये घर मगर
दरवाजे की जगह जड़ा हुआ है गत्ता
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सोमवार, 10 अगस्त 2009

बिस्तर क्यूँ इतना सलवटी होता है ~~

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मौसम जब कभी पंचवटी होता है
बिस्तर भी बहुत तब सलवटी होता है

जहाँ डूब के दम तोड़ती हैं फितरतें
वो जज़्बातों की ही तलहटी होता है

जब-जब तुम्हें पास अपने पाता हूँ
बावरा मन बेवजह ही नटी होता है

क्या दूँ तुम्हें दिल के सिवा अब बोलो
हर इक रिश्ता यहाँ तो बनावटी होता है

सजने को आतुर हो उठता है मन
रूबरू जब पैकर तेरा लटी होता है

बुधवार, 5 अगस्त 2009

तुम अरहर की दाल हो गये ---



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दुर्लभ काले घोड़े की नाल हो गये
तुम अब तो अरहर की दाल हो गये

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पहुँच हमारी नुक्कड़ की दुकान तक
तुम मँहगे और ऊँचे मॉल हो गये

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हर सख्श की रंगत काली-पीली है
जाने क्या खाकर तुम लाल हो गये

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गूदड़ में कट जाती है सर्दी अपनी
तुम तो पश्मीना की शाल हो गये

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भला क्यूँ आस लगाये अब तुमसे
तुम जब अनुत्तरित सवाल हो गये

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