अँधेरों का ख़ौफ़
इतना कि
खिड़कियाँ
खुलने से मना कर देती हैं।
दरवाज़े
हर थाप पर
काँप जाते हैं।
छिपकलियाँ
दीवार से उतरकर
जिस्म पर रेंगने लगती हैं।
नींद भयभीत
दूर खड़ी
काँप रही है।
साँसें
अपनी ही आहट से
चौंक उठती हैं।
नारों की शक्लें
अनायास बदलकर
फुसफुसाहट बन गई हैं।
ये सब तब से है
जब से
अदालत ने साबित कर दिया—
मछलियों की मौत
पानी में डूबने से हुई है।
