सत्ता का हथियार है
म्यूज़िकल चेयर।
हाशिये पर खड़े लोग
हँसते हुए
खेल में शामिल होते हैं।
संगीत बजता है—
और
घुप्प अँधेरा
कर दिया जाता है।
वे गिरते-पड़ते
दौड़ते हैं
कुर्सियों के चारों ओर।
उन्हें भ्रम है—
अँधेरा छँटते ही
अगली बार
कुर्सी उनकी होगी।
संगीत रुकता है—
अँधेरा भी छँट जाता
है,
चकाचौंध रोशनी में।
लेकिन हर बार
कुर्सियों पर
पहले से ही
कोई न कोई
बैठा मिलता है।
बाकी
हाशिये पर
लौट जाते हैं।
फिर संगीत बजता है।
फिर दौड़।
फिर उम्मीद।
फिर वही कुर्सी।
और हर बार
खेल बदलता है,
खिलाड़ी बदलते हैं—
पर
कुर्सी पर बैठने वाले नहीं।
हाशिये के लोग
तालियाँ बजाते रहते हैं—
क्योंकि उन्हें
खेल में शामिल होने
का
भ्रम दिया गया है।

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