मेरे दिल में
जितना भी प्रेम था,
सब मैंने फिक्स
डिपॉजिट में
तुम्हारे पास रख
दिया।
अब मैं उसके ब्याज से ही
अपना काम चला रहा हूँ,
कभी यादों की आमदनी से,
कभी जुदाई की देयता से
हिसाब मिला रहा हूँ।
मेरे मन में अक्सर
फिक्स डिपॉजिट
तोड़कर
मूल प्रेम वापस लेने
का
विचार भी आया।
पर उस दृढ अनुबंध की
शर्तें
याद आ जाती हैं,
जिसमें अवधि के
स्थान पर
सिर्फ एक शब्द लिखा
था—
"निर्बाध"।
और फिर अगर
मैं अनुबंध तोड़ भी
दूँ,
तो कैसे संभाल
पाऊँगा
वह समस्त प्रेम—
जिसमें मेरे प्रेम
का मूलधन
और तुम्हारे प्रेम
का ब्याज
दोनों शामिल हैं।
क्योंकि यह सिर्फ
जमा पूँजी नहीं,
एक साझा खाता है,
जिसकी हर एक किस्त
में
हम दोनों का होना जरूरी
है।

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