और
सिर पकड़कर
सशरीर बैठ गया
सिर पकड़कर
सशरीर बैठ गया
उसने अजनबियों से
मदद मांगी
लोग ठिठककर आगे बढ़ गए
उसने अपने अज़ीज़ों को पुकारा
वे आए—
आश्वासन दिए,
हाथ बढ़ाए,
मगर फिर अधर में ही
छोड़कर चल दिए
अंततः
हर उम्मीद से परे जाकर
उसने खुद का हाथ पकड़ा
और
आहिस्ता-आहिस्ता
सशरीर खड़ा हो गया

10 टिप्पणियां:
बहुत अच्छा लिखा आपने रूह को छू लेने वाली बात कही है आपने
Thanks 😊
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 07 मई, 2026
को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
शुक्रिया
प्रेरक रचना
शुक्रिया
Wahh!!
Thanks 😊
सुंदर
Thanks 😊
एक टिप्पणी भेजें