जीतू
मुंडा,
तुमने अपनी बहन का कंकाल उठाया
यह साबित करने के लिए
कि वह सचमुच मर गई है।
पर
तुम भूल गए—
जिनके सामने तुम खड़े थे,
उनके कंधों पर पहले से ही
सच और संवेदना की लाशें सड़ रही थीं।
उनकी
आँखों की शर्म
और कानों की सुनवाई
किसी अंधे गोदाम में गिरवी रखी जा चुकी थी,
जहाँ हर चीख
फाइल बन जाती है,
और हर फाइल पर
धूल की सरकारी चादर डाल दी जाती है।
फिर
भी—
तुम हारे नहीं,
क्योंकि
तुम्हारे कंधे पर
सिर्फ एक कंकाल नहीं था,
पूरी अंधी व्यवस्था का
जिंदा सबूत लटका हुआ था।
16 टिप्पणियां:
बहुत ही मार्मिक रचना है सच बात है अंधी व्यवस्थता का ज़िंदा सबूत लटका हुआ था
धन्यवाद 😃
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शुक्रवार 01 मई, 2026
को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
निःशब्द!
😔
शुक्रिया
अत्यंत मार्मिक रचना
पत्थर की एक लकीर बनी रहो या खामोशी की अपनी तस्वीर बने रहो,,,
मार्मिक रचना
शुक्रिया
शुक्रिया
शुक्रिया
निःशब्द!.....मार्मिक
सटीक सत्य |
शुक्रिया
Thanks 😊
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