गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

व्यवस्था की लाश

जीतू मुंडा,
तुमने अपनी बहन का कंकाल उठाया
यह साबित करने के लिए
कि वह सचमुच मर गई है।

 

पर तुम भूल गए
जिनके सामने तुम खड़े थे,
उनके कंधों पर पहले से ही
सच और संवेदना की लाशें सड़ रही थीं।

 

उनकी आँखों की शर्म
और कानों की सुनवाई
किसी अंधे गोदाम में गिरवी रखी जा चुकी थी,
जहाँ हर चीख
फाइल बन जाती है,
और हर फाइल पर
धूल की सरकारी चादर डाल दी जाती है।

 

फिर भी
तुम हारे नहीं,

 

क्योंकि तुम्हारे कंधे पर
सिर्फ एक कंकाल नहीं था,
पूरी अंधी व्यवस्था का
जिंदा सबूत लटका हुआ था।


16 टिप्‍पणियां:

Razia Kazmi ने कहा…

बहुत ही मार्मिक रचना है सच बात है अंधी व्यवस्थता का ज़िंदा सबूत लटका हुआ था

M VERMA ने कहा…

धन्यवाद 😃

Digvijay Agrawal ने कहा…

 आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शुक्रवार 01 मई, 2026
को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
  

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

निःशब्द!

M VERMA ने कहा…

😔

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Anita ने कहा…

अत्यंत मार्मिक रचना

कविता रावत ने कहा…

पत्थर की एक लकीर बनी रहो या खामोशी की अपनी तस्वीर बने रहो,,,

Onkar ने कहा…

मार्मिक रचना

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

MY GOOD NIVESH ने कहा…

निःशब्द!.....मार्मिक

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सटीक सत्य |

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊