शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

आज़ादी का भ्रम

चलते-चलते अक्सर मैं
किसी चौराहे पर रुकता हूँ,
अनगिनत पैरों के निशानों के बीच
अपने निशान खोजता हूँ।

पर ठहरकर जब देखता हूँ—
तो चौंक जाता हूँ,
ये सारे निशान
मेरे ही पैरों के होते हैं।

सच तो ये है—
मंज़िल की तलाश में
मैं हर रास्ते पर चला हूँ,
हर मोड़ को अपनी मर्ज़ी समझा है।

और हर चौराहा
मुझे यही समझाता रहा—
कि चुनना मेरा हक़ है।

जबकि हक़ीक़त ये थी—
हर बार
मेरे सामने रखे गए थे
पहले से तय रास्ते।

और मैं—
आज़ादी के भ्रम में
उसी रास्ते पर निकल पड़ता रहा,

बस…
अगले चौराहे तक।

10 टिप्‍पणियां:

Aman Peace ने कहा…

Wah!!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Anita ने कहा…

कुछ क़िस्मत कुछ मेहनत, दोनों के मेल से ही बनता है जीवन

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Bharti Das ने कहा…

बहुत बढ़ियाँ

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Razia Kazmi ने कहा…

👌

Onkar ने कहा…

बहुत सुंदर

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊