खोदो—खोदो
गड्ढे खोदो—
रास्तों के किनारे,
सड़कों के बीच।
इतने
गहरे खोदो
कि जो गिरे,
बाहर आने का
ख़याल तक न करे।
याद
रखो—
गड्ढों में गिरे लोगों को
निकालने की हिमाक़त मत करना,
क्योंकि
जो बच निकलेगा
वह सवाल बन जाएगा।
मृतकों
के लिए
बेशक मुआवज़े घोषित कर दो,
पर याद रहे—
अमल नहीं,
सिर्फ़ घोषणा करनी है।
क्योंकि वोट का रिश्ता
ज़मीन से नहीं,
घोषणापत्रों से होता है।
गड्ढे
खोदो—
हर सवाल के चारों ओर,
हर उम्मीद,
हर विश्वास के चारों ओर।
क्योंकि
उम्मीद और विश्वास
सवाल पैदा करते हैं,
और सवाल
हमारे
‘विकास-मार्ग’ में
सबसे बड़ा गड्ढा होते हैं।
मत
भूलो—
विकास का रास्ता
गड्ढों से होकर जाता है।
इन गड्ढों से निकली मिट्टी से
ढक दो—
चीख़ों को,
नारों को,
और
सवालिया आँखों को।

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