शनिवार, 31 जनवरी 2026

जो चुप है वही ज़िंदा है


माना रेप हुआ है
पर घबराइए मत
नगर के चरित्र पर
इससे कोई दाग़ नहीं पड़ता।
दाग़ तो कपड़ों पर लगते हैं
संस्थाओं पर नहीं।

यह रेप नहीं है
यह एक प्रक्रिया है
जो कभी-कभी
अनुशासन सिखाने के लिए
अपने आप घट जाती है।

अपराधी की तलाश व्यर्थ है
क्योंकि यहाँ
हर आदमी
सम्मानित है
कोई पिता है
कोई पति
कोई संस्कारी मतदाता।

औरत अगर टूटी है
तो इसका मतलब यह नहीं
कि किसी ने तोड़ा है
संभव है
वह पहले से ही
कमज़ोर थी।

कत्ल हुआ है
हाँ, हुआ है
पर हत्या शब्द
बहुत असभ्य है
इसे यूँ कहिये
जीवन की समयपूर्व समाप्ति

पोस्टमॉर्टम बताता है
चाक़ू मिला
पर हाथ नहीं मिला
गोली मिली
पर उँगली नहीं मिली
इसलिए
हत्यारा नहीं मिला।

वैसे भी
मरा हुआ आदमी
क्या साबित करेगा?

जो ज़िंदा हैं
उनकी गवाही ज़्यादा ज़रूरी है
और ज़िंदा वही है
जो चुप है।

न्यायालय की दीवारों पर
इंसाफ़ टंगा है
पर पहुँच से बाहर
ठीक सीसीटीवी की तरह
सब देखता है
कुछ नहीं पकड़ता।

अख़बारों से अनुरोध है
इसे सनसनी न बनाएँ
यह नगर
संवेदनशील नहीं
सुसंस्कृत है।

और अंत में
एक सर्वसम्मत निर्णय
यह अपराध नहीं
यह एक आँकड़ा था
जो गलती से
इंसान बन गया।

2 टिप्‍पणियां:

Razia Kazmi ने कहा…

उधेड़ती हुई रचना
बहुत सुंदर

M VERMA ने कहा…

धन्यवाद