लुटेरों के हाथों में अब है कमान,
डरी सहमी बैठी है हर इक दुकान।
जहाँ खोद बुनियाद सब चुप खड़े,
हैं लरज़ते हुए आज खामोश मकान।
गए ढूँढने जो यहाँ क़ातिलों को,
मिला उनके हाथों में क़त्ल-ओ-सामान।
थी बस्ती कभी ख़्वाब की रौशनी,
बना मोड़ हर आज तो श्मशान।
उठी जब भी ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ उँगली,
बदलने लगे चेहरे सब हुक्मरान।
जहाँ लोग वहशी, वहीं ख़ौफ़ है,
थमी हर ढलान और थमा तूफ़ान।
गुनाह है ये 'वर्मा' कि तुम चुप रहो,
जले शहर और सब को है इत्मिनान।
लरज़ते = कांपते

8 टिप्पणियां:
लुटेरों के हाथों में अब है कमान,
शानदार ग़ज़ल
धन्यवाद
बहुत खूब
धन्यवाद
लाज़वाब गज़ल सर।
-------
कृष्ण और राम ले चुके अवतार,
अब क़लमकार ही शस्त्रधारी है।
रो-धोकर हालात नहीं बदलते,
उठो,अब जागृति की बारी है।
सादर।
------
जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३० जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
जी सादर आभार
अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता प्रभावशाली कलाम
धन्यवाद
एक टिप्पणी भेजें