शनिवार, 29 नवंबर 2025

“तुम्हारी सोच जलेगी — वह नहीं।” .... (पत्नी कोई वस्तु या खिलौना नही)

 

पत्नी होती है
सहचर, साथी,
चलती है कदम से कदम,
पर तुम्हारी परछाई बनकर नहीं।

वह थकती है, सोचती है,
उलझती है, टूटती है,
और फिर खुद ही
अपने टुकड़ों को जोड़कर
फिर खड़ी हो जाती है
जबकि तुम
आज भी उसके वजूद को
सिर्फ भूमिकासमझने की भूल करते हो।

तुम्हारी वो सड़ी हुई
सामंतवादी सोच
जिसे तुम परवरिश का नाम देते हो
हर बार उसे खिलौना बनाती है,
सामान समझती है,
और बराबरी से तुम्हें
अजीब-सा डर लगने लगता है।

पर सुनो
वह कोई वस्तु नहीं,
न तमाशा, न खिलौना।
वह एक पूरा मन है,
पूरा वजूद
जिसे तुम चाहो या न चाहो,
वह हमेशा बराबरी पर ही खड़ी रहेगी।

अगर तुम्हें औरत में आज भी

चीज़, खिलौना या वस्तु नज़र आती है,
तो तुम्हे ज़रूरत है -
अपनी सोच का पोस्टमॉर्टम करने की।

12 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

😊 thanks

Razia Kazmi ने कहा…

करारा..वाह

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

हरीश कुमार ने कहा…

सुन्दर

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह

M VERMA ने कहा…

धन्यवाद

Subodh Sinha ने कहा…

सादर नमन आपको ...
"वह हमेशा बराबरी पर ही खड़ी रहेगी।"
परन्तु.. एक औरत .. पत्नी, बहन, बेटी, माँ के रूप में केवल "बराबरी" पर ही नहीं, वो तो पुरुषों से भी ऊपर ही रहती है .. एक सृष्टिकर्ता के रूप में .. पुरुष को भी नौ माह अपने कोख में पालने के बाद जन्म देकर .. शायद ...

M VERMA ने कहा…

यही सच है
धन्यवाद

Aman Peace ने कहा…

Wah!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Admin ने कहा…

अक्सर हम भूल जाते हैं कि हमारी जिंदगी में जो महिला है, वह सिर्फ सहारा या साथ नहीं, बल्कि अपना पूरा वजूद लेकर चलती है। उसने भी अपने संघर्षों से खुद को खड़ा किया है, लेकिन हम उसे कभी बराबरी की नजर से नहीं देखते।