गुरुवार, 2 मई 2019

वैयाकरण’ की साजिश

तुमने कहा—
रूको, मत जाओ।

मैंने समझा—
रूको मत, जाओ।

और मैं
चुपचाप चला आया था उस दिन—
बिना किसी शोर,
बिना किसी तूफ़ान।

कितना भयानक
ज़लज़ला आया था उस दिन।

काश!
तुमने देखा होता
चट्टान का खिसकना।

काश!
तुमने भी देखा होता
वह मंज़र—
जब एक मकान
ढहा था, अधबना,
और
उड़ने को आतुर एक कबूतर
दब गया था।

शायद यह—
‘वैयाकरण’ की साज़िश थी।

काश! हम शब्दों के जाल से परे देख पाते,
तो शायद…
वो अधबना मकान
घर बन जाता,
और वो दबा हुआ कबूतर
फिर से उड़ पाता।


8 टिप्‍पणियां: