तुमने कहा—
रूको, मत जाओ।
मैंने समझा—
रूको मत, जाओ।
और मैं
चुपचाप चला आया था उस दिन—
बिना किसी शोर,
बिना किसी तूफ़ान।
कितना भयानक
ज़लज़ला आया था उस दिन।
काश!
तुमने देखा होता
चट्टान का खिसकना।
काश!
तुमने भी देखा होता
वह मंज़र—
जब एक मकान
ढहा था, अधबना,
और
उड़ने को आतुर एक कबूतर
दब गया था।
शायद यह—
‘वैयाकरण’ की साज़िश थी।
काश! हम शब्दों के जाल से परे देख पाते,
तो शायद…
वो अधबना मकान
घर बन जाता,
और वो दबा हुआ कबूतर
फिर से उड़ पाता।

Waah sir
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
जवाब देंहटाएंसुन्दर कविता
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंओह्ह्ह.. वाहह्हह... हृदयस्पर्शी रचना।
जवाब देंहटाएंबिंब तो क़माल का है... 👌👌
शुक्रिया
हटाएंवाह क्या खूब कहा...
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
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