रविवार, 31 मई 2009

द्रोपदी का चीरहरण ! ! !


वो कौन है
जो सूरज को ढक लेता है?
वो कौन है
जो अन्धकार बोता है?

खौलते प्रश्नों के अम्बार
क्यों अनुत्तरित रह जाते है?
क्या पाने की लालसा में
सब कुछ सह जाते हैं?
सूत्रधार क्यो छोड़ रहा
अपना आधार?
अभिनेता क्यो
ज़ार-ज़ार रोता है?

मृत्यु जबकि
सामने खड़ी है
जिजीविषा क्यो
मृतप्राय पड़ी है?
सत्य क्यों असहाय होता है?
बढ़ता कोलाहल
घटता सुकून
रोटी मयस्सर नहीं
इन्सां को दो जून
पग-पग पर कौन कटुता का
विषबेल बोता है?

तुमने ही तो रची थी
महाभारत कथा
कैसे फिर सह जाते हो
मानव व्यथा?
मुर्दों का तांडव
चुप क्यों हैं पांडव?
द्रोपदी का चीरहरण
संस्कार रोता है

खंडित विश्वास क्यों
बड़े हो रहे हैं?
ख़ुद ही के खिलाफ क्यों
खड़े हो रहे हैं?
आस्थाओं का पथप्रदर्शक
स्वयं पथ खोता है।

वो कौन है
जो सूरज को ढक लेता है?

16 टिप्‍पणियां:

Yogesh Verma Swapn ने कहा…

sunder rachna.

ravishndtv ने कहा…

कौन है जो सूरज को ढंक लेता है।

बहुत अच्छा।

M Verma ने कहा…

धन्यवाद प्रतिक्रियाओ के लिये

vandana gupta ने कहा…

lajawab prashn.sundar rachna.

Razia ने कहा…

अच्छी रचना

M Verma ने कहा…

Thanks for comments

Arvind Gaurav ने कहा…

bahut hi bahiya.....ek khoobsoorat rachna

sandhyagupta ने कहा…

खंडित विश्वास क्यों
बड़े हो रहे हैं?
ख़ुद ही के खिलाफ क्यों
खड़े हो रहे हैं?
आस्थाओं का पथप्रदर्शक
स्वयं पथ खोता है।

वो कौन है
जो सूरज को ढक लेता है?

Atyant prabhavi.Shubkamnayen.

Sajal Ehsaas ने कहा…

is savaal ne jhakjhor ke rakh diya...aapki ye kavita adhnunik hindi ki behatareen rachnaao me se ek hai yakeenan...likhte rahiye

Unknown ने कहा…

Hi Raaz,

Thank You Very Much for sharing this great post.

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-Thanks for sharing

- Pallavi Joshi

Senior Account

Udan Tashtari ने कहा…

शानदार अभिव्यक्ति!!

अजय कुमार ने कहा…

सुंदर है

vandana gupta ने कहा…

बेहद प्रशंसनीय रचना।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

खंडित विश्वास क्यों
बड़े हो रहे हैं?
ख़ुद ही के खिलाफ क्यों
खड़े हो रहे हैं?
आस्थाओं का पथप्रदर्शक
स्वयं पथ खोता है।
bahut hi yuktisangat prashn

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Yathaarth ... prasaangik samvaad ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खंडित विश्वास क्यों
बड़े हो रहे हैं?
ख़ुद ही के खिलाफ क्यों
खड़े हो रहे हैं?
आस्थाओं का पथप्रदर्शक
स्वयं पथ खोता है।

बहुत सुन्दर प्रस्तुति