हवा
में गूँज रही है
एक पंक्ति—
"लड़की होकर गाली दे रही है।"
पर
इससे पहले
किसी ने कब कहा था—
"लड़का होकर गाली दे रहा है?"
या
फिर—
"लड़की होकर भी चुप क्यों रहती है?"
उनका
प्रतिकार
यदि गालियों की शक्ल में भी फूटा,
तो याद रखिए—
हर गाली से पहले
बहुत-सी अनसुनी चीखें
दम तोड़ चुकी होती हैं।
मैं
गालियों का पक्षधर नहीं,
प्रतिकार का पक्षधर हूँ।
फिर
भी
गालियाँ
देती लड़कियाँ
मुझे अच्छी लगती हैं,
क्योंकि गालियाँ
इस मुक्ति की
पहली सीढ़ी भर हैं।
प्रतिकार
के इस स्वर को
एक दिन
गालियों से परे
अपना मुहावरा गढ़ना होगा।
तंग
गलियों से निकलकर
खुले आसमान में
अपनी आवाज़ की
पहचान बनानी होगी।

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