चलते चलते
ये कहाँ आ गया मैं
जुमलों की घास उगी है जहाँ
शब्द बिखरे पड़े हैं,
पर अर्थ खो दिए हैं
- खुद अपने
‘अर्थ’
रास्ते भटक गए हैं
और ढूढ रहे हैं
अपने ही पदचिह्न
सिसक रहीं हैं जहाँ सिसकियाँ
हर कथन पर जहाँ हाबी हैं हिचकियाँ
मेरे ही सवाल
मेरे ही सामने
लेकर खड़ी हो गईं हैं
सवालों की तख्तियाँ
जवाब नदारत है
लौटना चाहता हूँ मैं अब,
पर कैसे?
तंज भरे बगावती तेवर के साथ
पैरों ने
साफ शब्दों में मना कर दिया है।
कल शायद मिलूँ
किसी अखबार के
‘‘जनहित
सूचना’’ के काॅलम
में
जहाँ लिखा होगा -
‘‘जिसने
अर्थ खोजे थे,
वही अर्थ उसे ही निगल गए।’’

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