Saturday, March 16, 2019

धुप्प अँधेरे में


धुप्प अँधेरे में
खुद को तलाशने की कोशिश में
स्वयं के एहसासों के अवशेषों से
कई बार टकराया
निःशब्द स्व-श्वासों की आहट से
कई बार चकराया

दिग्भ्रमित करने के लिए
तैनात हो गए  
मेरे ही खंडित सपने
आक्रोशित से खड़े मिले
तथाकथित मेरे अज़ीज़, मेरे अपने
सबने मेरी गुमशुदगी का इल्जाम
मुझ पर ही लगाया

मकड़ी के उलझे जालों के बीच से;
अवगुंठित अनगिन सवालों के बीच से,
खुद का हाथ पकड़कर
खुद के करीब लाया  
खुद को फिर भी प्रतिपल
खुद से और दूर पाया

8 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (18-03-2019) को "उभरे पूँजीदार" (चर्चा अंक-3278) (चर्चा अंक-3264) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Pammi singh'tripti' said...
This comment has been removed by the author.
Pammi singh'tripti' said...

आपकी लिखी रचना आज ," पाँच लिंकों का आनंद में " बुधवार 20 मार्च 2019 को साझा की गई है..
http://halchalwith5links.blogspot.in/
पर आप भी आइएगा..धन्यवाद।

दिगंबर नासवा said...

जीवन की कशमकश कहाँ दूर होती है ...
अभी लगता है हम करीब हैं दुसरे पर मुद्दतों दूर हो जाते हैं ...
मन के भावों की गहरी अभिव्यक्ति ...

Kamini Sinha said...

तथाकथित मेरे अज़ीज़, मेरे अपने
सबने मेरी गुमशुदगी का इल्जाम
मुझ पर ही लगाया

बड़ी गहरी जज्बात ,बहुत खूब ,होली की हार्दिक शुभकामनाये

Sudha devrani said...

गहन एवं गूढ रचना...बहुत सुन्दर..।

HJA said...

iAMHJA

संजय भास्‍कर said...

मन के भावों की गहरी अभिव्यक्ति .
कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-

शब्दों की मुस्कुराहट
http://sanjaybhaskar.blogspot.com