मंगलवार, 29 सितंबर 2009

सर्दियो मे पिघलना है ~~


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मौसम का मिज़ाज बदलना है
सर्दियो मे हमको पिघलना है


सफर सहेज लिया है दामन में
सूरज से भी पहले निकलना है

माना 'तंज' बोये हैं पत्थरों ने
ठोकरों के बाद भी संभलना है

बाजुओ की पतवार सलामत रहे
लहरों के खिलाफ़ फिसलना है

क्यूँ करू मैं इंतज़ार बादलो का
धूप के साये में ही टहलना है

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शनिवार, 26 सितंबर 2009

दुकान लुटाकर जश्न मनाओ ~~~


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हर नाले में कंकाल मिलेगा
हर जिस्म पर खाल मिलेगा


सच कहना है, कहो पर तय है
कितनों का फूला गाल मिलेगा

आम आदमी आतुर क्यूँ हो
तुमको तो बस सवाल मिलेगा

तन्दूरी संस्कृति है अब तो
बहुतों का खाली थाल मिलेगा


दुकान लुटाकर जश्न मनाओ
हर नुक्कड़ पर मॉल मिलेगा
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शनिवार, 19 सितंबर 2009

नामुमकिन है बरी हो पाना ~~

पीठ पीछे भी तुम एक आँख रखो
ज़ेहन में अपने एक सलाख रखो

सबूत माँगेंगे लोग आग लगने का
अपनी मुट्ठियों में तुम राख रखो

सूरज से गुफ़्तगू करने निकले हो
सिर पे तुम दरख़्त की शाख रखो

नामुमकिन है तुम्हारा बरी हो पाना
संग अपने सबूत बेशक लाख रखो

चल रहे तीर दिल को छू न सकें
जिस्म के आर-पार एक सुराख रखो

हवा का रुख़ समझ कर ही क़दम रखना
बचा के आँधियों से अपना चिराख़ रखो

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