अँधेरों का ख़ौफ़
इतना कि
खिड़कियाँ
खुलने से मना कर देती हैं।
दरवाज़े
हर थाप पर
काँप जाते हैं।
छिपकलियाँ
दीवार से उतरकर
जिस्म पर रेंगने लगती हैं।
नींद भयभीत
दूर खड़ी
काँप रही है।
साँसें
अपनी ही आहट से
चौंक उठती हैं।
नारों की शक्लें
अनायास बदलकर
फुसफुसाहट बन गई हैं।
ये सब तब से है
जब से
अदालत ने साबित कर दिया—
मछलियों की मौत
पानी में डूबने से हुई है।

जब तक मानव अपने भीतर की शक्ति से, आत्मशक्ति से नहीं जुड़ता, भय से मुक्ति संभव ही नहीं, कोई न कोई भय पीछे लगा ही रहेगा
जवाब देंहटाएंसत्य
हटाएंwah!
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंवाह 👌
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
हटाएंकहते रहिए वो कह देंगे मछलियों ने आत्महत्या की है :)
जवाब देंहटाएंजी 😔
हटाएंवाह!सुंदर सृजन!
जवाब देंहटाएंThanks ❤️
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