आमतौर पर
सत्ता
कान रहित होती है,
और उसकी अ-आंख होती है
जो
देखती कम,
दिखाती अधिक हैं।
जनता
की वे चीखें
जिनसे
दीवारें तक
भरभराकर गिर सकती हैं,
सत्ता की चौखट तक पहुँचते-पहुँचते
फुसफुसाहट में बदल जाती हैं।
फिर
सत्ता
उस फुसफुसाहट का
अनुवाद करती है—
अपनी सुविधा की भाषा में,
और
रिटर्न गिफ्ट की तरह
वही अनुवाद
जनता को लौटा देती है।
उसका
मुँह
टीवी और रेडियो हैं,
जो हर चीख को
ध्वनिपरिवर्तक की तरह
उपलब्धियों के शोर में
बदल देते हैं।
भूख—
आँकड़ा बन जाती है,
बेरोज़गारी—
आश्वासन,
दमन—
व्यवस्था,
और प्रतिरोध—
विकास में बाधा।
लेकिन
हर आवाज़
इतनी आसानी से
नहीं मरती।
कुछ
स्वर
इतिहास की राख में
दबे हुए अंगार होते हैं।
वे
चुप रहते हैं,
सुलगते रहते हैं,
समय की प्रतीक्षा करते हैं।
फिर
एक दिन
वे राख झाड़कर उठते हैं
और
अपनी ही भाषा में
बोलते हैं।
उस
दिन
सत्ता के सारे
ध्वनिपरिवर्तक
शोर करते रह जाते हैं—
मगर
बधिर हो जाते हैं।
क्योंकि
कुछ आवाज़ें
सुनी नहीं जातीं,
वे इतिहास लिखती हैं।

11 टिप्पणियां:
जो आवाज़ें इतिहास बनाती हैं, वही मज़बूत होती हैं और वही बदल सकती हैं सत्ता का रुख़, कहा भी है, यथा राजा तथा प्रजा, प्रजा को अपने हक़ के लिए खड़ा होना पड़ेगा, बिना रोये तो माँ भी बच्चे को दूध नहीं पिलाती
इतिहास बन रहा है, इतिहास बनेगा
Wahh!
THANKS
शायद इतिहास बनाया जा रहा है अपने हिसाब की किताबों के लिए |
यकीनन
शुक्रिया
अ-ऑंख वाला बिंब जबरदस्त है सर, वैसे तो हर पंक्ति बेहद धारदार है। प्रभावशाली अभिव्यक्ति सर।
समय की छलनी में सत्ता का वैभव जब छनता है
तब इतिहास दरबारों में नहीं सड़कों पर लिखा जाता है। इतिहास के पन्नों पर किये जा रहे मौन हस्ताक्षर हर बार सत्ता परिवर्तन के बाद पलटकर जरूर पढ़ा जाता है। आप जो बदलना चाहते हैं वो मृगमरीचिका ही प्रतीत होती है।
सुखद समय की प्रतीक्षा चिरस्थाई पीड़ा है शायद।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २१ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
शुक्रिया
प्रतीक्षारत रहता हूँ आपकी समीक्षा पूरित टिप्पणी का
Thanks 😊
सुन्दर
Thanks 😊
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