हँसते हुए चेहरे ओढ़े अक्सर
ये रोते हैं,
पता है फसल का हश्र, फिर भी बोते हैं।
चीखती हुई भूख में
क्या-क्या खोते हैं.,
पेट और पीठ अब गले लगकर
रोते हैं।
बंद मकानों में झाँकना नहीं
चाहिए,
वहाँ उघड़े हुए बेहाल सपने
सोते हैं।
आँकड़ों की दीवार आवाज़
घोंट देती है,
रिसते छप्पर सच को बारिश
में डुबोते हैं।
मत पूछना कि कितने हलाक हो
गए,
चादर में लिपटे ख़्वाब भी
अब रोते हैं।
ख़ुद का ही जिस्म ख़ुद उठाकर
ढोते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें