कुछ शब्द
बिना बोले
निःशब्द कर देते हैं।
कुछ शब्द
बहुत बोलते हैं,
पर उन्हें
सुनता कोई नहीं।
वाक्यों के अर्थ
ज़रूरी नहीं कि
शब्दों के अर्थ से
मेल खाएँ।
अक्सर
शब्द कुछ और कहते हैं,
और वाक्य
कुछ और।
कभी-कभी
महज़ एक अल्पविराम,
या एक अर्धविराम,
अर्थ को
अनर्थ तक पहुँचा देता है।
फ़र्क देखिए—
बोलो मत, सुनो।
और
बोलो, मत सुनो।
ध्वनि-विज्ञान भी
कहाँ समझ पाया है
शब्दों की पूरी यात्रा।
कभी
अस्फुट-सा उच्चरित
महज़ तीन शब्द—
"आई लव यू"
किसी एक कान में नहीं,
पूरे अस्तित्व में
प्रतिध्वनित होते हैं,
और फिर
अनुनाद बनकर
बहुत दूर तक
गूँजते रहते हैं।

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