आईना
होकर पत्थर के गाँव में रहता है,
इश्क़ भला बिखर जाने से कब डरता है।
जानता है कि ढह
जायेगा रेत का महल,
हर रोज़ मगर नींव फिर वही धरता है।
समझाते रहे किनारे, वो क्यों मानेगा,
डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।
मुस्कुराहट उसके
हालात का तर्जुमा नहीं,
काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।
हवा गुमसुम है, तेल और बाती नहीं है,
बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।
रौंदना, कुचलना तुम्हारी फितरत होगी,
तिनका-ए-दूब फिर भी कहाँ मरता है?
ठोकरों की भी कोई न
कोई सरहद होगी,
'वर्मा' इन्हीं ठोकरों से हर बार सँवरता है।

Wah!
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंबेहतरीन शायरी
जवाब देंहटाएंजी शुक्रिया
हटाएंबेहतरीन, लाज़वाब अर्थपूर्ण रचना है सर।
जवाब देंहटाएंहर शेर बहुत अच्छा है।
सादर
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २३ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
शुक्रिया 😃
हटाएंव्वाहहहह
जवाब देंहटाएंसुंदर
आभार