बुधवार, 17 जून 2026

तिनका-ए-दूब

आईना होकर पत्थर के गाँव में रहता है,

इश्क़ भला बिखर जाने से कब डरता है।

 

जानता है कि ढह जायेगा रेत का महल,

हर रोज़ मगर नींव फिर वही धरता है।

 

समझाते रहे किनारेवो क्यों मानेगा,

डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।

 

मुस्कुराहट उसके हालात का तर्जुमा नहीं,

काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।

 

हवा गुमसुम हैतेल और बाती नहीं है,

बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।

 

रौंदनाकुचलना तुम्हारी फितरत होगी,

तिनका-ए-दूब फिर भी कहाँ मरता है?

 

ठोकरों की भी कोई न कोई सरहद होगी,

'वर्माइन्हीं ठोकरों से हर बार सँवरता है।

7 टिप्‍पणियां:

Aman Peace ने कहा…

Wah!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Anita ने कहा…

बेहतरीन शायरी

M VERMA ने कहा…

जी शुक्रिया

Sweta sinha ने कहा…

बेहतरीन, लाज़वाब अर्थपूर्ण रचना है सर।
हर शेर बहुत अच्छा है।
सादर
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २३ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया 😃

Digvijay Agrawal ने कहा…

व्वाहहहह
सुंदर
आभार