अक्सर
मैं
अपने घर के बाहर
पत्र-पेटी में
एक कोरा काग़ज़ डाल देता हूँ।
फिर
चाभी से उसे खोलता हूँ,
जैसे डाकिया
अभी-अभी तुम्हारा ख़त छोड़ गया हो।
उस कोरे काग़ज़ को
भीतर लाकर
बड़े मनोयोग से पढ़ता हूँ।
यक़ीन मानो,
उस ख़त की चुप्पी
तुम्हारी चुप्पी से
हूबहू मेल खाती है।
तुम्हारी इसी ख़ामोशी ने
न जाने कितना कुछ
कहे जाने से,
और कितना कुछ
सुने जाने से
वंचित कर दिया।
पर
यह भी सच है—
जब-जब
तुमने अपने होंठ भींचकर
शब्दों को क़ैद करना चाहा,
तुम्हारी आँखें
चुपके से
सारी चुगली कर जाती थीं।
उस
कोरे काग़ज़ पर
आज भी
तुम्हारी वही चुगलखोर आँखें
उभर आती हैं।
और तुम्हारी अनुपस्थिति में भी
इस कोरे काग़ज़ के सहारे
हमारे बीच बचा हुआ
वह अनकहा संवाद
फिर से जी लेता हूँ।

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