बुधवार, 20 मई 2026

प्रश्नवाचक से पूर्णविराम तक

प्रश्नों का जन्म
उत्तर से पहले होना
एक स्वाभाविक प्रक्रिया है—
यही होना चाहिए,
और
बरसों से यही होता आया था।

प्रश्न जन्म लेते थे
किसी बेचैनी की कोख से,
किसी अन्याय की चुभन से,
किसी मासूम जिज्ञासा
या
अधूरी समझ की प्यास से।

तब
उत्तर धीरे-धीरे खोजे जाते थे—
बहसों, तर्कों, असहमतियों
और
अनगिनत ठोकरों के बीच।

मगर
दौर बदला,
विरासत बदली,
और
व्यवस्था भी बदल गई।

अब
पहले उत्तर गढ़े जाते हैं—
चमकदार कमरों में,
बंद दरवाज़ों के पीछे,
सुविधाजनक निष्कर्षों की तरह।

फिर
उनके अनुरूप
प्रश्न रचे जाते हैं—
जैसे किसी अपराध के बाद
सबूत तैयार किए जाते हैं।

आज के प्रश्न
अक्सर अपनी शक्ल बदलते मिलते हैं—
प्रश्नवाचक चिन्ह से हटकर
पूर्णविराम बनते हुए।

वे प्रश्न नहीं लगते अब,
निर्णय लगते हैं;
जिनमें जिज्ञासा नहीं,
पूर्वनिर्धारित आग्रह धड़कता है।

उनकी दृष्टि में
सत्य की तलाश नहीं,
बल्कि
भीड़ को किसी तय उत्तर तक
हाँक ले जाने की युक्ति होती है।

और फिर
ये प्रश्न
अविकसित भ्रूण-से जन्मे शिशु-से
असक्त सिद्ध होते हैं—
न ठीक से साँस ले पाते हैं,
न प्रतिरोध कर पाते हैं,
न अपने पैरों पर
ठहर पाते हैं।

वे
अपनी सार्थकता सिद्ध करने से पहले ही
सत्ता, प्रचार और शोर के
कृत्रिम ऑक्सीजन पर
जीने को विवश हो जाते हैं।

सबसे भयावह यह नहीं
कि उत्तर पहले लिखे जा रहे हैं—
बल्कि यह है कि
सार्थक प्रश्नों के इस विकृत रूपांतरण के बीच
नए प्रश्नों का जन्म ही बाधित हो गया है।

और इस मौन प्रक्रिया में
लोकतंत्र
स्वयंभू होता जा रहा है।

12 टिप्‍पणियां:

Anita ने कहा…

आज किसी के पास उत्तर खोजने का समय नहीं है, इसलिए प्रश्न भी नहीं उठाता, और ऐसे में उन लोगों की बन आती है जिनके पास बने-बनाये उत्तर हैं, बहुत प्रभावशाली लेखन!

कविता रावत ने कहा…

सच चिंतनीय स्थिति है ,, उत्तर पहले मिल जाएंगे तो प्रश्न नाम भर के रह जाएंगे

M VERMA ने कहा…

धन्यवाद आपके द्वारा मूल्यांकन के लिए 😃

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया 😃

MANOJ KAYAL ने कहा…

सुंदर सृजन!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Sweta sinha ने कहा…

प्रश्न और उत्तर की प्रक्रिया
निर्बाध चलती रहती है;
कभी अधूरे शब्दों का लबादा पहनकर
कभी पूरे मौन का इरादा पहनकर
प्रश्न करना हमारा अधिकार है
उत्तर देना न देना हमारा विचार है
आलोचनात्मक विश्लेषण क़लम की धार है
यही तो लोकतंत्र का असली संसार है।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २२ मई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

M VERMA ने कहा…

वाह क्या खूब कहा आपने
शुक्रिया 😃

Razia Kazmi ने कहा…

वाह क्या बात कही है इस मौन प्रक्रिया में लोकतंत्र स्वयंभू होता जा रहा है

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया ❤️

हरीश कुमार ने कहा…

बहुत सुंदर रचना

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया 😃