कुछ इस तरह फुसफुसाती है हवा,
शायद कोई ग़ज़ल सुनाती है हवा।
सुकून फिर भला कैसे नसीब हो,
ज़ख्मों को रोज़ छेड़ जाती है हवा।
यादों की राख अब भी गर्म है कहीं,
धीरे-धीरे फिर सुलगाती है हवा।
तुम्हें भूलने में उम्र गुज़र गई,
तेरा ही नाम दोहराती है हवा।
जब जानना चाहा हाल तुम्हारा,
हर बार बात टाल जाती है हवा।
तुम्हारी ख़ुशबू पुरवाई बनकर,
शाख़-ए-वजूद हिलाती है हवा।
बीते दिनों की अनकही वो बातें,
न जाने कहाँ से लाती है हवा।
“वर्मा” दिल को लाख संभालो मगर,
पल भर में सब उड़ा जाती है हवा।

वाह बहुत ही शानदार लिखा है
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएं
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 13 मई 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
शुक्रिया
हटाएंशानदार कृति
जवाब देंहटाएंआभार
सादर
धन्यवाद
हटाएंउम्दा शायरी
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
हटाएं