शुक्रवार, 1 मई 2026

औज़ार नहीं, इंसान हैं ये

 

आज मजदूर दिवस है,
पर
मजदूर को
आज भी काम पर जाना है
उसे यह दिन
कैलेंडर में नहीं,
पेट में महसूस होता है।

औज़ारों के साथ
औज़ार बन जाना
उनकी नियति है।
किसी सभ्य नगर में
अक्सर चौराहों पर
इनका भी हाट लगता है
जहाँ
कोई चमचमाती कार से उतरकर
इन्हें
दिन भर के लिए
खरीद लेता है।

शाम होते-होते
वे फिर
वापस रख दिए जाते हैं
उसी चौराहे पर
अगले दिन
फिर बिकने के इंतज़ार में।

इनका आवास
शहर के नक्शे से बाहर होता है,
क्योंकि
इनके हिस्से में
कोई स्थायी पता नहीं होता।

निर्माणाधीन अट्टालिकाओं के साये में,
बजबजाती नालियों के किनारे,
तिरपालों और अधूरे सपनों के बीच
ये बसते हैं
उन्हीं इमारतों के पास
जिन्हें वे बनाते हैं,
पर
जिनमें कभी रह नहीं पाते।

आज के दिन
व्याख्यानों के केंद्र में
इन्हें रखा जाएगा
और
मंच से उतरते ही
फिर
हाशिए पर धकेल दिया जाएगा।

10 टिप्‍पणियां:

Anita ने कहा…

प्रभावशाली लेखन

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Aman Peace ने कहा…

Wahh!

M VERMA ने कहा…

😊

हरीश कुमार ने कहा…

बेहतरीन

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सटीक

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Razia Kazmi ने कहा…

हक़ीक़त है

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊