सुना है
जनगणना होने वाली है,
और इन दिनों
मकान गिने जा रहे हैं।
काश—
इस गणना से पहले
हो पाती
बेमकानों की गिनती।
तुम गिन लोगे
छत, दीवार, खिड़कियाँ,
पर्दे—
पर छूट जाएगा
वो “घर”,
जिसने आसमान को ही
अपनी छत मान लिया है।
तुम्हारे आँकड़ों में दर्ज होंगे
ईंट, पत्थर, फर्श
की डिज़ाइन—
एक सजी-संवरी संख्या-तालिका,
पर नहीं होगा कोई पता
उनका,
जिनकी रातें
फुटपाथों, डिवाइडरों
और सड़कों के किनारों पर कटती हैं—
जहाँ हवा भी
पहुँचने से पहले
हिचकती है।
क्या तुम्हारे प्रपत्र में
कोई जगह है
उनके लिए—
जिनका शरीर ही मकान है,
झलकती पसलियाँ दीवार,
हथेलियाँ दरवाज़े,
और आँखें—
एक अधखुली खिड़की,
जिससे झाँकती है
भूख, ठंड और इंतज़ार?
या फिर इस बार भी
वे सिर्फ “अनुमान” बनेंगे,
औपचारिकताओं में दर्ज होकर
आँकड़ों की भीड़ में
बिना गिने ही
गायब कर दिए जाएँगे?
और अंत में—
जब गिने जा रहे हैं
मकान और इंसान,
तो क्या कभी
पीड़ा और संत्रास की भी
कोई गणना होगी?
या फिर
दर्द हमेशा की तरह
आँकड़ों से बाहर ही
बेघर रह जाएगा।

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