बुधवार, 22 अप्रैल 2026

विलुप्त होती प्रजाति

एक समय था—
जब ईमानदार और सच्चरित्र लोग
बहुतायत में पाए जाते थे।

पर बदले हुए इस माहौल में
वे खुद को ढाल न सके,
न सीख पाए समझौतों की भाषा—

और फिर
डार्विन के सिद्धांत के अनुसार
धीरे-धीरे
विलुप्त होते गए।

अब बची हैं बस
उनकी कहानियाँ,
कुछ दुर्लभ किस्से—
जिन्हें सुनकर
लोग मुस्कुरा देते हैं,
मानो कोई कल्पना हो।

मगर यह पूरी सच्चाई नहीं—
इस प्रजाति का
सम्पूर्ण विनाश अभी हुआ नहीं है।

दृष्टिगोचर न सही,
भीड़ भरे शहरों में
वे बुझती हुई बत्तियाँ हैं—
जो हर झोंके के साथ
और मद्धम पड़ती हैं,
पर अभी भी जल रही हैं।

शायद वे सुषुप्त हैं,
अनुकूल समय की प्रतीक्षा में—
या फिर
हमारी नज़रों से बचकर
अब भी
ईमानदारी जी रहे हैं।

16 टिप्‍पणियां:

Digvijay Agrawal ने कहा…

 आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शुक्रवार 24 एप्रिल, 2026
को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
  

Anita ने कहा…

धरती टिकी है ऐसे हो सीधे-सच्चे लोगों पर

Razia Kazmi ने कहा…

बहुत सुंदर रचना है सच बात है अभी भी कुछ ईमानदार लोग हैं जो दुनिया चल रही है

M VERMA ने कहा…

आभार प्रतिक्रिया के लिए

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

नूपुरं noopuram ने कहा…

निश्चित रुप से ऐसा ही है । हम सबने महसूस किया है ।

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

बहुत अच्छी और एकदम सच्ची बात कह दी आपने

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Aman Peace ने कहा…

Wah!!!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Madhulika Patel ने कहा…

खरे सोने सी सच बात लिख दी आपने,

Admin ने कहा…

आपने ईमानदारी को जिस तरह एक “लुप्त होती प्रजाति” की तरह दिखाया है, वो बहुत चुभता है और सच्चाई भी लगता है। आप निराशा दिखाते हो, लेकिन साथ में उम्मीद भी छोड़ते हो, और यही इसे खास बनाता है। मुझे लगता है कि ऐसे लोग आज भी हैं, बस शोर से दूर रहते हैं।

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

M VERMA ने कहा…

आपका विश्लेषण मायने रखता है