न्यूटन,
तुम ग़लत थे
तुमने
सेब को गिरते देखा,
और खींच दी नियम की रेखा,
और गुरुत्वाकर्षण के
सार्वभौमिक सत्य के नियंता बन गए।
काश,
तुमने देखा होता
उनको जो प्रेम करते हैं,
जो तुम्हारे गुरुत्वाकर्षण को
नहीं मानते हैं।
गिरना
क्या है,
वे नहीं जानते हैं।
गुरुत्वाकर्षणीय
साज़िशें होती रहीं
उन्हें गिराने को,
सज़ा दी गई
उन्हें डराने को।
पर
क्या वे गिरे?
पर क्या वे डरे?
वे
तो सर्वदा
तुम्हारे नियम के
प्रतिगामी रहे,
वे तो सर्वदा
ऊर्ध्वगामी रहे।
काश,
तुम उस दिन
सेब की बगिया में नहीं,
प्रेम की बगिया में होते।

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 29 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
हटाएंBahut Badiya
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंयार, ये कविता बहुत अलग सोच देती है। तुमने न्यूटन के नियम को प्रेम के नजरिए से पलट दिया, यह बात काफी दिलचस्प लगी। मुझे यह लाइन खास लगी कि प्रेम करने वाले गिरना नहीं जानते। सच में, जब इंसान सच्चे दिल से जुड़ता है तो वह हालात से ऊपर उठ जाता है।
जवाब देंहटाएंसार्थक टिप्पणी के लिए शुक्रिया
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंवाह 👌
जवाब देंहटाएंThanks 😊
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