एक निडर राजा था,
उसे किसी से डर नहीं लगता था।
डरता था तो बस—
प्रेस कॉन्फ़्रेंस से।
मंत्रिपरिषद ने समझाया—
“महाराज, प्रेस कॉन्फ़्रेंस से
अच्छा प्रभाव पड़ता है।”
राजा ने
काफ़ी सोच-विचार के बाद
हिम्मत जुटाई।
एक अर्से बाद
प्रेस कॉन्फ़्रेंस रखी गई।
पत्रकार कतार में खड़े थे—
कुछ नया पूछने को,
कुछ पुराना टटोलने को।
तभी उनकी नज़र पड़ी
राजा के सूचना-पट्ट पर—
जिस पर साफ़ लिखा था:
“प्रश्नों के साथ
अंदर आना सख़्त मना है।”
केवल वही पत्रकार
अंदर आ पाएँगे
जो सिर्फ़
हाँ में हाँ मिलाएँगे।
प्रवेश-द्वार पर तलाशी ली गई,
जो प्रश्नों के साथ आए—
वे गिरफ़्तार कर लिए गए,
और उनके प्रश्न
तार-तार कर दिए गए।
पर कुछ जिद्दी प्रश्न
पीछे के दरवाज़े से
अंदर प्रवेश कर गए...
प्रश्नों की भनक लगते ही
राजा सुरक्षा घेरे में छिपकर
गुप्त मार्ग से होते हुए
सभाकक्ष से बाहर हो गए।
अंततः
आधिकारिक विज्ञप्ति जारी की गई—
“राजा पूर्णतः निडर हैं,
केवल कुछ असामाजिक प्रश्नों के कारण
स्थिति का आंशिक पुनर्मूल्यांकन
अत्यंत सावधानीपूर्वक
किया जा रहा है।
प्रेस स्वतंत्र है—
बशर्ते वह
उत्तर पहले से जानती हो।”

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