लगता है हमारा
धर्म-प्रचार तंत्र
जंग खा गया है,
तभी तो लोगों को
“जय श्रीराम” और
“अल्लाहु अकबर” के बीच
अचानक याद आ जाती है—
अपनी भूख,
अपनी बेरोज़गारी,
अपने बच्चों की फीस,
और खाली जेबों का कोहराम।
बदहाली को
खुशहाली बताने वाला सॉफ्टवेयर
कहीं से भी आयात कर लो,
आँकड़ों की चमक में
सच्चाई का चेहरा
लहूलुहान ही सही।
और हाँ,
थोक के भाव में तिरपाल मँगवा लो—
कि बुलडोज़रों के ‘न्याय’
से
जो मलबे बचे हैं,
उन्हें ढंकना अभी बाकी है।
आख़िर
अंतरराष्ट्रीय मेहमान आने वाले हैं,
उन्हें शहर दिखेगा—
देश नहीं,
सजावट दिखेगी—
हक़ीक़त नहीं।
सड़कों पर रंग होगा,
दीवारों पर नारे होंगे,
और पर्दों के पीछे
लोग अपने ही जीवन से
बेदख़ल खड़े होंगे।
क्योंकि स्वागत की परंपरा में
हमने यह हुनर सीख लिया है—
सच को छिपाकर
व्यवस्था को मुस्कुराना।

9 टिप्पणियां:
Wah!
Thanks 😊
सच देखना,दिखाना जरूरी भी है जरूरत भी सहमत हैं...पर मेहमानों के सामने अपने घर का मान मटियामेट करने से क्या मिल जायेगा? हर मुद्दे पर विरोध करना अधिकार है आपकी स्वतंत्रता और तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था को जीवंत रखने के लिए पर ऐसे???
खैर...।
आपकी लिखी हर रचना मुझे फिर से लिखने को प्रेरित कर रही है आभारी हूं सर।
सादर।
-----
नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २४ फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
धन्यवाद, आपके विचारों के लिए।
मेरी कविताओ का उद्देश्य सच्चाई का आईना दिखाना मात्र है
आपकी प्रेरणा और स्नेह के लिए आभारी।
बेहतरीन रचना
वाह
धन्यवाद
शुक्रिया
एक टिप्पणी भेजें