एक
नाबालिग चिड़िया
उड़ान का संतुलन सीख रही थी।
उसकी आँखों में
बस आसमान की ऊँचाइयाँ थीं।
तभी
उड़ान पर अपना एकाधिकार समझने वाले
बीस-बाइस गिद्ध
उस पर टूट पड़े,
और नोच डाला
उसका पूरा आकाश।
कई सफेद कबूतर
इस पूरी वारदात के गवाह थे।
उन्होंने
धीरे से नज़रें फेर लीं
और शांति का मुखौटा ओढ़े
आसमान निहारते रहे।
उनका तर्क था—
यदि वे हस्तक्षेप करते,
तो उनके शफ़्फ़ाक वजूद पर
दाग़ लग जाता।
फिर देखते-ही-देखते
हर नुक्कड़ पर
एक नुची हुई चिड़िया
दम तोड़ती दिखाई देने लगी।
कुछ शुतुरमुर्ग भी थे,
जो सच से ज़्यादा
रेत की तलाश में थे।
कुछ मोमबत्तियाँ जलीं,
कुछ नारे गूँजे,
कुछ तस्वीरें बदलीं,
कुछ बयान आए,
कुछ आश्वासन दिए गए।
मगर
गिद्धों की उड़ान पर
कभी कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगा।
और अंत में—
कठघरे में
हर बार
चिड़िया ही खड़ी मिली।

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