इसी चौराहे पर
एक कत्ल हुआ,
सरेआम—गोली मारी गई।
हैरत ये नहीं
कि खून बहा सड़कों पर,
हैरत तो ये है—
जो मरा है
वह पहली बार नहीं मरा।
वह पहले भी मारा गया था,
कल किसी और चौराहे पर,
और यकीन मानो—
कल फिर मारा जाएगा
किसी नए नाम से,
किसी नई भीड़ के सामने।
और जो खड़ा है
ट्रिगर पर उंगली रखे—
वह भी कातिल नहीं है,
क्योंकि यहाँ
हर रोज चेहरा बदलता है,
पर उंगली नहीं बदलती।
वह उंगली
दरअसल किसी एक की नहीं—
पूरी व्यवस्था की है,
जो हर चौराहे पर
खुद को बेकसूर साबित कर देती है।

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