उसकी शिनाख़्त नहीं हो पाई,
और उसे पंचनामा करके
आनन-फानन में
दफ़न कर दिया गया।
पोस्टमार्टम की
रस्म-अदायगी भी नहीं हुई—
क्योंकि
उसके फटे कपड़ों से
झाँक रहे थे
उसके जिस्म पर
कुछ “सभ्य” दाँतों
के निशान।
वे निशान
इतने परिचित थे
कि कागज़ों ने
आँखें मूँद लीं,
और कानून ने खुद
तोड़ दिया कानून का दायरा
चश्मदीदों ने
दबी ज़ुबान में बताया—
जब आसमान में
कुछ गिद्ध मंडरा रहे थे,
तब तक
वह ज़िंदा थी।

10 टिप्पणियां:
बहुत ही मार्मिक रचना है
😔
जब आसमान में
कुछ गिद्ध मंडरा रहे थे,
तब तक
वह ज़िंदा थी।
मर्मस्पर्शी
😔
मन को झकझोरने वाली बेहद मर्म स्पर्शी अभिव्यक्ति सर।
एक स्त्री की दुर्दशा पर उसके अंतर्मन की दशा का हम महज अनुमान ही लगा सकते हैं।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बिडम्बना है कि आज के समाज में यह आम बात होती जा रही है
अत्यंत मार्मिक रचना
Thanks
Wah!!
Thanks
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