गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

सभ्य" दाँतों के निशान

 

उसकी शिनाख़्त नहीं हो पाई,
और उसे पंचनामा करके
आनन-फानन में
दफ़न कर दिया गया।

पोस्टमार्टम की
रस्म-अदायगी भी नहीं हुई
क्योंकि
उसके फटे कपड़ों से
झाँक रहे थे
उसके जिस्म पर
कुछ सभ्यदाँतों के निशान

वे निशान
इतने परिचित थे
कि कागज़ों ने
आँखें मूँद लीं,
और कानून ने खुद
तोड़ दिया कानून का दायरा

चश्मदीदों ने
दबी ज़ुबान में बताया
जब आसमान में
कुछ गिद्ध मंडरा रहे थे,
तब तक
वह ज़िंदा थी।

6 टिप्‍पणियां:

Razia Kazmi ने कहा…

बहुत ही मार्मिक रचना है

M VERMA ने कहा…

😔

Digvijay Agrawal ने कहा…

जब आसमान में
कुछ गिद्ध मंडरा रहे थे,
तब तक
वह ज़िंदा थी।
मर्मस्पर्शी

M VERMA ने कहा…

😔

Sweta sinha ने कहा…

मन को झकझोरने वाली बेहद मर्म स्पर्शी अभिव्यक्ति सर‌।
एक स्त्री की दुर्दशा पर उसके अंतर्मन की दशा का हम महज अनुमान ही लगा सकते हैं।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

M VERMA ने कहा…

बिडम्बना है कि आज के समाज में यह आम बात होती जा रही है