Tuesday, May 8, 2012

इस नगर में और कोई परेशानी नहीं है ….

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खाना नहीं, बिजली और पानी नहीं है

इस नगर में और कोई परेशानी नहीं है

.

चूहों ने कुतर डाले हैं कान आदमी के

शायद इस शहर में चूहेदानी नहीं है 

.

चहलकदमी भी है, सरगोशियाँ भी हैं

मंज़र मगर फिर भी तूफानी नहीं है

.

आये दिन लुट जाती है अस्मत यहाँ

कौन कहता है यह राजधानी नहीं है

.

अपनों पर बेशक तुम यकीं मत करो

बेईमानों के बीच मगर बेईमानी नहीं है

.

बादलों को तो गगन चूमने नहीं दिया

कहते फिरे माँ का आँचल धानी नहीं है

.

हिस्से तुम्हारे इसलिए ‘किस्से’ नहीं हैं

क्योंकि संग तुम्हारे, तुम्हारी नानी नहीं है

44 comments:

expression said...

बहुत सुंदर....................

हर शेर लाजवाब...........
नानी नहीं तो किस्से कहाँ........बादल नहीं तो धरा धानी कहाँ......

वाह.................

सादर.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अपनों पर बेशक तुम यकीं मत करो

बेईमानों के बीच मगर बेईमानी नहीं है

.
वाह ....बहुत खूब ... पूरी गजल ही बहुत कुछ कह रही है ॥

Anupama Tripathi said...

sunder shayari ....!!
shubhkamnayen .

वाणी गीत said...

इस शहर में कोई परेशानी नहीं है ...
ना में हाँ का यह किस्सा भी शानदार है !

प्रवीण पाण्डेय said...

अहा, पढ़ने का आनन्द आपकी हर पंक्तियों में छलक रहा है..

रविकर फैजाबादी said...

बेईमानों के बीच मगर बेईमानी नहीं है |

बहुत सुंदर |

अनुपमा पाठक said...

हिस्से तुम्हारे इसलिए ‘किस्से’ नहीं हैं
क्योंकि संग तुम्हारे, तुम्हारी नानी नहीं है
वाह!

रश्मि प्रभा... said...

हिस्से तुम्हारे इसलिए ‘किस्से’ नहीं हैं

क्योंकि संग तुम्हारे, तुम्हारी नानी नहीं है... बेजोड़

Rajesh Kumari said...

वर्मा जी बहुत सुन्दर व्यंग का पुट लिए हुए बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है आपने क्या कहने हर शेर लाजबाब है

राजीव तनेजा said...

बढ़िया कटाक्ष करती सुन्दर रचना

Sonal Rastogi said...

bahut khoob

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

अपनों पर बेशक तुम यकीं मत करो

बेईमानों के बीच मगर बेईमानी नहीं है

.

बादलों को तो गगन चूमने नहीं दिया

कहते फिरे माँ का आँचल धानी नहीं है

बहुत सुंदर !

वन्दना said...

चूहों ने कुतर डाले हैं कान आदमी के

शायद इस शहर में चूहेदानी नहीं है

क्या कहूँ गज़ब का कटाक्ष करती गज़ल है।

डॉ टी एस दराल said...

चूहों ने कुतर डाले हैं कान आदमी के
शायद इस शहर में चूहेदानी नहीं है

बहुत बढ़िया . यथार्थ सत्य .

sushma 'आहुति' said...

yatharth ko batlaati behtreen abhivaykti....

आशा जोगळेकर said...

खाना नहीं, बिजली और पानी नहीं है
इस नगर में और कोई परेशानी नहीं है .।

और
हिस्से तुम्हारे इसलिए ‘किस्से’ नहीं हैं
क्योंकि संग तुम्हारे, तुम्हारी नानी नहीं है ।


पूरी गज़ल शानदार ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 10 -05-2012 को यहाँ भी है

.... आज की नयी पुरानी हलचल में ....इस नगर में और कोई परेशान नहीं है .

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

आये दिन लुट जाती है अस्मत यहाँ

कौन कहता है यह राजधानी नहीं है

Bahut Umda....

दीपिका रानी said...

बहुत सुंदर

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

हिस्से तुम्हारे इसलिए ‘किस्से’ नहीं हैं

क्योंकि संग तुम्हारे, तुम्हारी नानी नहीं है

sundar gazal !

dheerendra said...

बादलों को तो गगन चूमने नहीं दिया
कहते फिरे माँ का आँचल धानी नहीं है,......

वाह,...बहुत .सुंदर गजल,...वर्मा जी
my recent post....काव्यान्जलि ...: कभी कभी.....

Suman said...

बहुत सुंदर रचना .....

sangita said...

कटाक्ष करती सुन्दर रचना |

yashoda agrawal said...

बेईमानों के बीच मगर बेईमानी नहीं है ....
शानदार रचना...
साधुवाद

Reena Maurya said...

बहुत ही सुन्दर
बेहतरीन अभिव्यक्ति....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
--
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
टनकपुर रोड, खटीमा,
ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308.
Phone/Fax: 05943-250207,
Mobiles: 08542068797, 09456383898,
09808136060, 09368499921,
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Website - http://uchcharan.blogspot.com/

dheerendra said...

बादलों को तो गगन चूमने नहीं दिया
कहते फिरे माँ का आँचल धानी नहीं है,......

वाह,...बहुत .सुंदर गजल,...वर्मा जी

MY RECENT POST.....काव्यान्जलि ...: आज मुझे गाने दो,...

manukavya said...

एक एक मिसरा..व्यंग्य और कटु सत्य का अद्भुत संगम है... यथार्थ परक प्रभावशाली रचना के लिए बधाई स्वीकार करें..
सादर
मंजु

रचना दीक्षित said...

बादलों को तो गगन चूमने नहीं दिया
कहते फिरे माँ का आँचल धानी नहीं है.

सुंदर गज़ल.

Sawai Singh Rajpurohit said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति.


माँ है मंदिर मां तीर्थयात्रा है,
माँ प्रार्थना है, माँ भगवान है,
उसके बिना हम बिना माली के बगीचा हैं!

संतप्रवर श्री चन्द्रप्रभ जी

आपको मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

प्रतिभा सक्सेना said...

विसंगतियों को क्या ख़ूब उजागर किया है.

प्रेम सरोवर said...

हिस्से तुम्हारे इसलिए ‘किस्से’ नहीं हैं

क्योंकि संग तुम्हारे, तुम्हारी नानी नहीं है

बहुत ही सुंदर भाव । मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

अच्छी ग़ज़ल......
सुन्दर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...






आदरणीय एम वर्मा जी
नमस्कार !

कमाल की ग़ज़ल लिखी है , कुछ शे'र तो 'सवा शे'र' साबित हो रहे हैं …
* खाना नहीं, बिजली और पानी नहीं है
इस नगर में और कोई परेशानी नहीं है

* आये दिन लुट जाती है अस्मत यहां
कौन कहता है यह राजधानी नहीं है

* अपनों पर बेशक तुम यकीं मत करो
बेईमानों के बीच मगर बेईमानी नहीं है

वाह वाह वाह !
आपकी पिछली दो पोस्ट में प्रस्तुत ग़ज़लें पढ़ कर भी दिली मसर्रत हुई …
बहुत बहुत मुबारकबाद !
हार्दिक शुभकामनाएं !

मंगलकामनाओं सहित…

-राजेन्द्र स्वर्णकार

Arvind Mishra said...

क्या कहने ..ऐसा ही संसार है अब ! :)

mahendra verma said...

खाना नहीं, बिजली और पानी नहीं है
इस नगर में और कोई परेशानी नहीं है

वाह, क्या जबर्दस्त मतअला है।
सभी शेर लाजवाब।
पढ़कर अच्छा लगा वर्मा जी।

दिगम्बर नासवा said...

चूहों ने कुतर डाले हैं कान आदमी के
शायद इस शहर में चूहेदानी नहीं है ...

वाह ... क्या शेर है ... गहरा कटाक्ष है बदलती व्यवस्था पे ... पूरी गज़ल लाजवाब है ...

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

मजेदार और बेहद सार्थक सत्य प्रस्तुति...

Prem Farukhabadi said...

खाना नहीं, बिजली और पानी नहीं है
इस नगर में और कोई परेशानी नहीं है

यह शेर काफी अच्छा लगा .

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

अपनों पर बेशक तुम यकीं मत करो

बेईमानों के बीच मगर बेईमानी नहीं है.... aaur naani wala sher to wakai is duniya ke hath se lagbhag chin chuki hui dharohar hai..waakai nani ka nahi koi sani..duniya ka sabse pyara rista...bahut seedhe sacchi baat bilkul sacche seedhe tareeke se..sada r badhayee

सुरभि said...

वर्मा जी वर्तमान परिदृश्य में आपकी रचना बिलकुल सटीक बैठती है...राजधानी होने की विदमबना को आपने बखूबी उभारा है.... राजधानी/ महानगरों के चमक दमक भरे आवरण को परत दर परत उधेड़ने का अंदाज काबिले तारीफ़ है :)

Anjani Kumar said...

"अपनों पर बेशक तुम यकीं मत करो
बेईमानों के बीच मगर बेईमानी नहीं है"
सर आपने तो एक्दम से दुष्यन्त कुमार जी की याद दिला दी
बेजोड़ ग़ज़ल

anand.editsoft said...

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anand.editsoft said...

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