मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

शिनाख़्त करो खुद की ~~

शहर के इन रेंगते वाहनों के बीच

शिनाख़्त करो खुद की

जीजिविषा से परे

हर पल डरे-डरे

मुट्ठी में रेत लिये

क्या तुम खुद ही के ख़िलाफ़

खड़े नहीं हो जाते हो?

अपने ही कद से

बड़े होने की कोशिश में

चौराहों के आदमख़ोर जंगल में

ख़ुद का कद -

और बौना नहीं पाते हो?

हुलिया ये है कि

तुम्हारा तो कोई हुलिया ही नहीं है

तन्दूर से गुर्दे तक

तुम कहीं भी पाए जा सकते हो

हर सच के एवज़ में

तुम झुठलाए जा सकते हो.

ज़मीर पर खड़े होने के ज़ुर्म में

तुम जमीन से काट दिए गये हो

बोटियों की शक्ल में तुम

चन्द लोगों में बाँट दिए गये हो.

उम्र से तो तुम

ख़ुद की शिनाख़्त कर ही नहीं सकते

क्योंकि तुम हर उम्र के हो,

पर हमेशा तुम

अपने उम्र से बड़े दिखते हो

अपने लहू से

कारपेट रंगते बच्चे से लेकर

अपने खोये बच्चे को तलाशते

अनगिन झुर्रियों वाले बाप के बीच

तुम्हारी कोई भी उम्र हो सकती है.

तुम्हारे पैरों की बिवाईयों सा

फटा-चिथड़ा है तुम्हारा लिबास

जब तुम सपने देखते हो

तुम्हें लगता है कि अपने देखते हो

त्रासदी ये है कि

तुम्हारा कोई सपना ही नहीं है

तुम्हारे इर्द-गिर्द

तुम्हारा कोई अपना ही नहीं है.

हक़ीकत है कि

तुम्हारी कई पीढ़ियाँ भटक रही हैं

तलाशती हुई खुद को

हुलिया, उम्र और लिबास से

क्योंकि वे परे हैं

जीजिविषा, आस्था और विश्वास से

 

तुम्हारी शिनाख़्त तो

ख़ुद ब ख़ुद हो जायेगी

जब तुम शिनाख़्त कर लोगे उनकी

जो तुम्हें तुमसे ही बांट रहे हैं

तुम्हारे ही हाथों तुम्हें ही काट रहे हैं

आसमाँ की बुलन्दियों पर

तुम्हारी पहचान उभरेगी

तुम अपनी मुट्ठियाँ

हवा में लहराकर तो देखो --

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हिन्दयुग्म 'यूनिकवि' प्रतियोगिता नवम्बर मास में पंचम स्थान प्राप्त रचना

हिन्दयुग्म में पूर्व प्रकाशित

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मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

सन्नाटा ~~

मुझे डर लगता है
सन्नाटे से—

क्योंकि पहली बार
इसी सन्नाटे में
मैंने पढ़ी थी
मंटो की “खोल दो”
और
शोर करता हुआ सन्नाटा
ज़ेहन में
आकर बैठ गया था।

क्योंकि
इसी सन्नाटे में
उभरती हैं
बलात्कार की शिकार
मासूम नूरों की चीख़ें—
क्रूर अट्टहास के
साये तले।

याद करो
उस सन्नाटे को—

जब इलाज के लिए लाए मरीज़ का
गुर्दा निकाल लिया गया था;

जब हूर-सी बच्ची
हलाक कर दी गई
और
माँ-बाप की
तिलस्मी नींद
नहीं टूटी;

जब किसान
चुपचाप
घास की रोटियाँ खाते रहे
और
आँकड़े
उन्हें
बदस्तूर
झुठलाते रहे;

जब तंदूर ने
रोटी की जगह
औरत का जिस्म
भूना था;

जब चलती कार में
एक लड़की की
आबरू—
(हाँ, यहीं
काँप जाती है भाषा)

जब—
जब—

हाँ, हाँ—
मुझे डर लगता है
सन्नाटे से।

पर कब तक—
मैं,
और शायद तुम भी,
इस सन्नाटे से
डरते रहेंगे?

इससे पहले कि
यह और गहरा हो जाए,
तोड़ना ही होगा
इसका तिलिस्म—
यह सन्नाटा।

अब
तोड़ना ही होगा।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

रोटियाँ उदास हैं ~~

बहुरूपिये खयाल हैं

फेंकते जाल हैं

.

ज़मीर बेच दिया

अब ये मालामाल हैं

.

रोटियाँ उदास हैं

रूठ गये दाल हैं

.

फुसफुसा रहे दरख़्त

गहरी कोई चाल है

.

डूब गये खेत-घर

सूख गये ताल हैं

.

बेअसर हर बात से

बहुत मोटी खाल है

.

इंसान की फितरत

अनसुलझा सवाल है

~~