बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

म्यूज़िकल चेयर बनाम लोकतंत्र

सत्ता का हथियार है
म्यूज़िकल चेयर।

हाशिये पर खड़े लोग
हँसते हुए
खेल में शामिल होते हैं।

संगीत बजता है—

और
घुप्प अँधेरा
कर दिया जाता है।

वे गिरते-पड़ते
दौड़ते हैं
कुर्सियों के चारों ओर।

उन्हें भ्रम है—

अँधेरा छँटते ही
अगली बार
कुर्सी उनकी होगी।

संगीत रुकता है—

अँधेरा भी छँट जाता है,
चकाचौंध रोशनी में।

लेकिन हर बार
कुर्सियों पर
पहले से ही
कोई न कोई
बैठा मिलता है।

बाकी
हाशिये पर
लौट जाते हैं।

फिर संगीत बजता है।

फिर दौड़।

फिर उम्मीद।

फिर वही कुर्सी।

और हर बार
खेल बदलता है,
खिलाड़ी बदलते हैं—
पर

कुर्सी पर बैठने वाले नहीं।

हाशिये के लोग
तालियाँ बजाते रहते हैं—

क्योंकि उन्हें
खेल में शामिल होने का
भ्रम दिया गया है।

8 टिप्‍पणियां:

Anita ने कहा…

हाशिये पर कोई नहीं खड़ा है आज, हरेक को अपनी बात कहने का हक़ है, जैसे हम और आप कह रहे हैं

M VERMA ने कहा…

हाशिये पर खड़े लोग नजरों से ओझल भी हो जाते हैं

Sudha Devrani ने कहा…

लेकिन हर बार
कुर्सियों पर
पहले से ही
कोई न कोई
बैठा मिलता है।

बाकी
हाशिये पर
लौट जाते हैं।
सही कहा कुर्सी पर बैठने वाले पहले से ही बैठे हैं ...बाकी सब भ्रम है।

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

क्योंकि उन्हें
खेल में शामिल होने का
भ्रम दिया गया है।
सटीक

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Aman Peace ने कहा…

Wahh!

M VERMA ने कहा…

Thanks