इन
रेप की वारदातों से
मेरा कोई सरोकार नहीं है—
क्योंकि
इनमें मेरी अपनी बेटी नहीं है।
वैसे
भी
मैं बहुत व्यस्त हूँ
अपनी
मोमबत्तियों की फैक्टरी में।
मातहतों
को हिदायत दे रहा हूँ—
उत्पादन बढ़ाओ,
चौबीसों घंटे चलाओ मशीनें,
क्योंकि
हर रेप के बाद
मोमबत्तियों की
माँग बढ़ जाती है।
मैंने
कहा—
मोम बचाकर रखना,
बाती का आयात कर लो,
कहीं ऐसा न हो
कि अगली चीख के बाद
मोमबत्तियाँ कम पड़ जाएँ।
क्योंकि
यहाँ
अपराध रोकने से
ज्यादा जरूरी है
अपराध के बाद
रोशनी का इंतजाम करना।
मैं
रोक सकता था
वह चीख—
मगर
चीख से पहले
मुझे आँकड़े चाहिए थे,
और चीख के बाद
मोमबत्तियाँ।
मैंने
मोमबत्तियों पर
एक नया नारा भी लिखवा दिया है—
“हम आपके साथ हैं।”
बस,
इतना पूछना मना है—
जब वह चीख रही थी,
तब
आप कहाँ थे?
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समाज में संवेदनशीलता की कमी, जनचेतना और नैतिक मूल्यों में गिरावट और नशे का बढ़ता चलन, कितने ही कारण हैं कि महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं। बच्चों को घर से ही अच्छे या बुरे संस्कार मिलते हैं, माँ ही पहली शिक्षक होती है। आज ज़रूरत है कि उन्हें सही-ग़लत की पहचान घर व विद्यालयों दोनों जगह करायी जाये
जवाब देंहटाएंयकीनन और सबसे बडी बात हमारी उदासीनता इन सबके लिये कमोबेश उत्तरदायी है
हटाएंअंतर्मन को झकझोरती बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति सर।
जवाब देंहटाएंकुछ और क्या लिखूं शब्द नहीं मिल रहे....।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ६ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।