रोटियों
से खेलने वाले
रोटियों के लिए तरसते
भूखे लोगों को
रोटियाँ बाँटते हैं।
फ़र्क़ बस इतना है कि
ये रोटियाँ
आटे से नहीं,
आँकड़ों से गढ़ी जाती हैं।
इनका जन्म
खेतों और चूल्हों में नहीं,
सात सितारा होटलों के
ठंडे, चमकदार कमरों में होता है,
जहाँ भूख पर
लंबी-लंबी चर्चाएँ होती हैं,
मगर
भूख
कभी उस मेज़ तक नहीं पहुँचती।
इन रोटियों पर
धार्मिक वैमनस्य की
मीठी परत चढ़ा दी जाती है,
और कृत्रिम आँकड़ों से
ढक दिया जाता है
भूख के सूचकांक का गिरता हुआ सच।
फिर
भूखे और नंगे लोग
अनजाने ही
एक ऐसे चक्रव्यूह में उतर जाते हैं
जहाँ
रोटियों की जगह
नारे परोसे जाते हैं,
और वे
अपने खाली पेट की आवाज़ दबाकर
उसी व्यवस्था की
जय-जयकार करने लगते हैं
जो उनकी थाली में
रोटी कभी नहीं आती—
सिर्फ़ रोटी के आँकड़े आते हैं।

असंवेदनशील शासन के जाल में फँसी जनता की पीड़ा को आपकी लेखनी शब्द दे रही है
जवाब देंहटाएंपीड़ा को शब्दों की जरूरत नहीं
हटाएंआपकी संवेदनशील मनोभाव पढ़कर मुझे मेरी लिखी रचना की कुछ पंक्तियां याद आ गयी।
जवाब देंहटाएं----------
दिखावे का ज़माना है साहिब
"किसी की भूख परोसना
भूख मिटाने से ज्यादा
आसान है शायद...!!
सादर
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
संवेदना का संवेदना से अद्भुत मिलाप
हटाएंशुक्रिया
बहुत बहुत अच्छी रचना लिखी है
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंThanks 😊
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंWah!
जवाब देंहटाएंThanks 😊
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